आंचल सा स्पर्श

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आंचल सा स्पर्श

वो हारा हुआ नहीं था, 
बस थका हुआ था बहुत... 
दुनिया की जंग लड़ते-लड़ते 
कंधे झुक गए थे चुपचाप।

फिर अचानक 
उसके कंधे पर एक हाथ रखा गया 
न बोली कुछ, न पूछा हाल 
बस रख दिया... जैसे रख देती है 
माँ, बिलखते बच्चे पर आंचल।

उस एक कोमल स्पर्श में 
सारे युद्ध हार जाना कबूल था,
सारी मर्दानगी पिघल जाना मंजूर था। 

क्योंकि हताश पुरुष को 
मनचाही स्त्री का हाथ 
समंदर में डूबते को 
किनारा सा लगता है...।

वो पल में बच्चा हो गया 
और उसकी हथेली 
पूरी कायनात हो गई।


प्रेम सरोवर

जानते हो …
प्रेम एक बार उतर जाए तो
सिर्फ़ याद नहीं बनता,
वह आदत, 
आदर और आत्मा का हिस्सा हो जाता है।

वह चला भी जाए
तो भीतर एक कमरा छोड़ जाता है
जहाँ स्मृतियाँ साँस लेती रहती हैं।

प्रेम की मृत्यु दरअसल
पूर्ण अंत नहीं होती,
वह हमें थोड़ा-सा अधूरा छोड़ जाती है।

हर बार जब प्रेम मरता है,
हम जीते तो रहते हैं…
पर भीतर कहीं
एक धड़कन हमेशा के लिए
चुप हो जाती है।

…और सच ये है—
वही चुप धड़कन
हमें उम्र भर सुनाई देती रहती है।

हम हँसते हैं, मिलते हैं, आगे बढ़ते हैं,
पर किसी मोड़ पर अचानक
वो नाम फिर से दिल में उतर आता है।

नया प्रेम आता भी है तो
पुराने की जगह नहीं लेता,
बस उसके बगल में
एक और कमरा बना देता है।

और इंसान…
पूरा कभी नहीं भरता फिर,
बस जीना सीख जाता है
उन अधूरे कमरों के साथ।

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भ्रम छोड़ दीजिए




"भ्रम छोड़ दीजिए"
ये मिट्टी के घर भी सिखाते हैं,  
हर दीवार दरकती है, हर छत टपकती है।  
फिर क्यों हम रिश्तों को पत्थर की लकीर मान लें?

जो कल तक अपना था, आज पराया है,  
जो हंसकर मिला था, वो ताना सुनाया है।  
तो इस भ्रम को भी अब जाने दीजिए,  

कि सब अपने हैं... ये मानना छोड़ दीजिए।

खुश रहना है तो दिल का बोझ हल्का करिए,  
उम्मीदों की गठरी को थोड़ा सा झटका करिए।  
जो साथ है उसका शुक्रिया करिए,  
जो चला गया... उसे अलविदा करिए।

टूटे घर में भी धूप आती है मित्र,  
बस खिड़की खोलिए, और भ्रम छोड़ दीजिए।



भावना का मिलन

कई बार जीवन में हम जाने अनजाने में ही अपनी खुशियों को किसी और की भावनाओं से बाँध लेते हैं।

ऐसा लगता है जैसे हमारे भीतर का मौसम अब हमारे नियंत्रण में नहीं रहा।
अगर वह उदास है, तो हमारे अंदर भी एक अजीब सी बेचैनी छा जाती है।
और अगर उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठे, तो हमारे दिल के कोने-कोने में रोशनी फैल जाती है।

फिर समझ आता है कि शायद हम “खुश रहना” नहीं, बल्कि “किसी और के ठीक होने से खुश होना” सीख लेते हैं।

यह एक अनोखा सा संबंध है,जहाँ दो आत्माएँ शब्दों से नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ जाती हैं।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी जन्म लेता है:
क्या हम अपनी खुशी को इतना बाहर रख दें कि वह किसी और के मनोभावों पर निर्भर हो जाए?

शायद असली यात्रा यही है,
प्यार करते हुए भी अपनी रोशनी को भीतर संजोकर रखना।

💫⚡️

छोड़ दीजिए


छोड़ दीजिए

एक दो बार समझाने से कोई नही समझ रहा है, तो सामने वाले को समझाना छोड़ दीजिए..

बड़े होने पर अगर बच्चे खुद फैंसले लेने लगें, तो उनके पीछे लगना छोड़ दीजिए...

गिने चुने लोगो से आपके विचार मिलते है मगर एक दो से नहीं मिलते तो उन्हें छोड़ दीजिए...

एक उम्र के बाद कोई आपको ना पूछे या कोई पीठ पीछे आपके बारे में गलत कहे, तो दिल पे लेना छोड़ दीजिए...

अपने हाथ में कुछ भी नही है, ये अनुभव आने पर भविष्य की चिंता करना छोड़ दीजिए...

इच्छा और क्षमता में बहुत फर्क पड़ रहा है, तो खुद से अपेक्षा करना छोड़ दीजिए..

हर किसी का जीवन अलग, कद, रंग सब अलग है, इसलिए दूसरों से तुलना करना छोड़ दीजिए...

बढ़ती उम्र में जीवन का आनंद लीजिए, रोज जमा और खर्च करने की चिंता करना छोड़ दीजिए....

अच्छा लगे तो ठीक, न लगे तो हल्के में लेकर छोड़ दीजिए....!!!

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"छोड़ दीजिए"
जो हाथ से फिसल जाए, उसे बहने दीजिए,
जो बात दिल को चुभे, उसे कहने दीजिए।
कल की चिंता, आज का बोझ,
सांस के साथ बस… छोड़ दीजिए।

जो लोग बदल जाएँ, उन्हें बदलने दीजिए,
हर रिश्ते को उम्र भर ढोना ज़रूरी नहीं—ये समझ लीजिए।

जो आपकी कद्र न करें, उनके पीछे क्यों भागना,
खुद को सस्ता बनाना बंद कीजिए।

हर जवाब देना ज़रूरी नहीं होता,
कभी खामोशी भी सबसे सटीक वार होती है।

हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं,
कुछ लड़ाइयाँ छोड़ना ही असली जीत होती है।

जो बीत गया, वो सिखाने आया था—सज़ा देने नहीं,
उसे बार-बार जीना बंद कीजिए।

हर गलती को ढोते रहोगे तो आगे बढ़ोगे कैसे?
थोड़ा खुद को भी माफ़ करना सीख लीजिए।

और सुनिए—
छोड़ना भागना नहीं होता,
कई बार यही सबसे समझदार फैसला होता है।

हर चीज़ पकड़कर रखने की आदत छोड़िए,
तभी हाथ खाली होंगे… कुछ बेहतर पकड़ने के लिए।



राधा की विडंबना


वो 'युग' और था,
ये युग और है।

तब 'राधा' होना पूज्य था,
अब 'राधा' होना हेय है।

तुम विकल्प ही रहोगी,
प्राथमिकता न हो पाओगी...!

एक पुरुष होकर जो स्त्री की
'मित्रता' की मर्यादा समझे,
निस्वार्थ प्रेम से उसे पोषित करे,
समाज की दूषित नजरों से बचाकर
अपने हृदय में अक्षुण्ण रखे—

वो मित्र कहाँ से लाओगी?
वो 'कृष्ण' कहाँ से लाओगी?
तुम कलयुग की राधा हो,
तुम पूज्य न हो पाओगी...!

कितना भी आलौकिक और नैतिक प्रेम हो तुम्हारा,
तुम दैहिक पैमाने पर नाप दी जाओगी...!

तुम मित्र ढूंढोगी,
वे प्रेमी बनना चाहेंगे,

तुम आत्मा सौंप दोगी,
वे देह पर घात लगाएंगे...
पूर्ण समर्पित होकर भी तुम 'राधा' ही रहोगी,
'रुक्मिणी' न बन पाओगी...!

“राधा प्रेम है—अनंत, निष्कलुष,
रुक्मिणी सामाजिक स्वीकृति है,
इस युग में लोग प्रेम नहीं,
स्वीकृति के पीछे भागते हैं...”

पर सत्य इतना एकांगी भी नहीं—
हर कहानी में एक पक्ष नहीं होता...
“हर पुरुष ‘कृष्ण’ नहीं, ये सत्य है,
पर हर पुरुष ‘दुर्योधन’ भी नहीं...”
कुछ दोष काल का भी है,

कुछ हमारी पहचान का भी—
हमने चेहरे देखे, इरादे नहीं,
शब्द सुने, सच्चाई नहीं...

अब प्रेम नहीं, विकल्पों का बाजार है,
हर दिल के पीछे एक विकल्प तैयार है।

यहाँ भावनाएँ नहीं, सौदे चलते हैं,
और रिश्ते भी शर्तों पर पलते हैं...

यहाँ प्रेम प्रमाण माँगता है,
विश्वास सवालों में तौला जाता है,

और जो आत्मा की भाषा बोले—
उसे अक्सर पागल कहा जाता है...
तुम राधा बनना चाहोगी,
पर युग तुम्हें समझेगा नहीं,
तुम प्रेम लिखोगी,
पर समाज उसे पढ़ेगा नहीं...।

क्योंकि यहाँ पूजा नहीं,
प्रदर्शन देखा जाता है,
और प्रेम नहीं—
उसका परिणाम देखा जाता है...

फिर भी अगर प्रेम करना—
तो राधा की तरह करना,
बिना शर्त, बिना स्वार्थ, बिना भय...
क्योंकि इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है—
लोग प्रेम चाहते हैं,
पर प्रेम करने का साहस नहीं रखते...

पुत्र वैभव के लिए

एक ऐसा पुरुष बनना तुम—
जो विपरीत परिस्थितियों में परुष हो,
जो अपने हालातों को दोष देने के बजाय
उन्हें बदलने की आदत रखता हो।
जिसके कदमों में मेहनत की ठसक हो,
मस्तिष्क में समझ और दूरदर्शिता हो 
जिसकी जेब भले भारी न हो,
पर कमाई साफ हो—
और नज़र झुकी न हो।
जो बोलने से पहले समझे,
और समझने के बाद डटे।
जिसके लिए स्त्री “सम्मान” का शब्द नहीं,
व्यवहार हो।
चेहरे पर सुकून भरा आत्मविश्वास
जो क्रोध में भी सीमा न लांघे,
और ताकत होने पर भी
उसका दिखावा न करे।
जो जिम्मेदारी से भागे नहीं—
उसे उठाए, निभाए, और चुपचाप पूरा करे।
क्योंकि असली पहचान शोर से नहीं बनती,
चरित्र से बनती है।

कोई बात बने

कोई बात बने मेरे लिखने से क्या, जो तुम ना पढ़ो,   तुम पढ़ लो जरा तो कोई बात बने। मेरे सोचने से क्या, जो तुम ना समझो,   तुम समझ ल...