पुत्र वैभव के लिए

एक ऐसा पुरुष बनना तुम—
जो विपरीत परिस्थितियों में परुष हो,
जो अपने हालातों को दोष देने के बजाय
उन्हें बदलने की आदत रखता हो।
जिसके कदमों में मेहनत की ठसक हो,
मस्तिष्क में समझ और दूरदर्शिता हो 
जिसकी जेब भले भारी न हो,
पर कमाई साफ हो—
और नज़र झुकी न हो।
जो बोलने से पहले समझे,
और समझने के बाद डटे।
जिसके लिए स्त्री “सम्मान” का शब्द नहीं,
व्यवहार हो।
चेहरे पर सुकून भरा आत्मविश्वास
जो क्रोध में भी सीमा न लांघे,
और ताकत होने पर भी
उसका दिखावा न करे।
जो जिम्मेदारी से भागे नहीं—
उसे उठाए, निभाए, और चुपचाप पूरा करे।
क्योंकि असली पहचान शोर से नहीं बनती,
चरित्र से बनती है।

कबीर का अहंकार


कबीर के जीवन का एक सूत्र है मुक्ति। सूत्र का अर्थ अत्यंत संक्षिप्त, सारगर्भित और गूढ़ ज्ञान प्रदान करने वाला नियम या धागा है, जो बड़ी बातों को कम शब्दों में समझाता है। यह ज्ञान को पिरोने वाला (धागे की तरह) आधार है।

 जिसमें अर्थ की गहराई और अध्यात्म की ऊंचाई दोनों अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त है। कबीर और रविदास, एक ही गुरु के शिष्य काशी के निवासी, सड़क वासी।

 कबीर से ज्यादा साधारण आदमी संसार में खोजना कठिन है और अगर कबीर मुक्ति तक पहुंच सकते हैं, तो हम सभी पहुंच सकते हैं। 

क्या काशी क्या ऊसर मगहर,

राम हृदय बस मोरा।

 जो कबीरा काशी मरै 

रामै कौन निहोरा।।


कबीर निपट अनपढ़ और गंवार हैं, 

मसि कागद छूवों नहीं, कलम गहो नहिं हाथ।

इसलिए गंवार के लिए भी आशा है; मुक्ति की।



कबीर की जाति-पांति का तो ठिकाना  है लेकिन ठौर नहीं  है – हिंदू के गर्भ से पैदा हुए,  मुसलमान के घर पले बढ़े। वह प्रेम की पैदाइश थे “ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पण्डित होय” जाति-पांति से परमात्मा का कुछ लेना-देना नहीं है। 


जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।


कबीर जीवन भर गृहस्थ रहे--जुलाहे-बुनते रहे कपड़े और बेचते रहे; 

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाये॥


वो हिमालय नहीं गये क्योंकि उनका परमात्मा घर पर भी आ सकता है, 

नैना अंतरि आव तूं,  ज्यूं हौं नैन झंपेऊँ |

       ना हौं  देखौं  और कूं , ना तुझ देखन देऊँ ||17 ||



हिमालय जाना आवश्यक नहीं। कबीर ने काशी ही नहीं, कुछ भी नहीं छोड़ा और सब कुछ पा लिया घर बैठे। 

बहुत दिनन थैं मैं प्रीतम पाये, भाग बड़े घरि बैठे आये॥


इसलिए कबीर की दृष्टि में छोड़ना पाने की शर्त नहीं हो सकती। कबीर के पास एक साधारण-सी पत्नी है, और जान गये कि सब राग-रंग, सब वैभव-विलास, सब सौंदर्य मन की ही कल्पना है।

 कबीर के अनुसार जब मन के अंदर से अहंकार, लोभ, मोह, और भय खत्म हो जाएँ—वही असली मुक्ति है।

मरने के बाद कुछ मिलने का इंतज़ार करना उनके अनुसार भागना है, समाधान नहीं।

“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं”

मतलब—जब तक “मैं” (अहंकार) था, तब तक ईश्वर नहीं दिखा।

जैसे ही “मैं” खत्म हुआ, वही मुक्ति है।


कबीर बार-बार कहते हैं कि इंसान अपनी पहचान—जाति, धर्म, पद, शरीर—इन सब में फँसा हुआ है।
मुक्ति, इन झूठी परतों से बाहर निकलना है।
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर”
मतलब—शरीर मरता है, पर मन और माया नहीं मरते।
तो असली काम शरीर छोड़ना नहीं, मन को जीतना है।

कबीर के यहाँ गुरु कोई पूजा का पात्र नहीं, बल्कि जागने का माध्यम है।
मुक्ति तभी जब तुम खुद को पहचान लो।
"बलिहारी गुरु आपणै...",
"सतगुरु की महिमा आनंत.."
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े…”

यहाँ गुरु इसलिए बड़ा है क्योंकि वो तुम्हें तुम्हारे असली स्वरूप तक पहुँचाता है।

कबीर मंदिर-मस्जिद, कर्मकांड, दिखावे—सबको सीधे काट देते हैं।
“पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ…”
ज्ञान किताबों से नहीं, अनुभव से आता है—और वही मुक्ति देता है।
और अंत में सबके मुक्ति की कामना करते हैं सबके कल्याण की कामना करते हैं और कहते हैं "कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर....
इससे बड़ी लोकमंगल, लोककल्याण और लोकमुक्ति का मार्ग क्या हो सकता है।

कबीर ने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया- और जिसने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया उसका बड़ा भरोसा बढ़ता है।  तब इस दुनिया में अगर तुम वंचित हो तो अपने ही कारण वंचित हो, परिस्थिति को दोष मत देना। जब भी परिस्थिति को दोष देने का मन में भाव उठे, कबीर का ध्यान करना। कम से कम मां-बाप का तो तुम्हें पता है, घर-द्वार तो है, तालाब के किनारे पैदा होते ही फेंके तो नहीं गए। हस्ताक्षर तो कर ही लेते हो। थोड़ी-बहुत शिक्षा हुई है, हिसाब-किताब रख लेते हो। वेद, कुरान, गीता भी थोड़ी पढ़ी है। न सही बहुत बड़े पंडित, छोटे-मोटे पंडित तो तुम भी हो ही। तो जब भी मन होने लगे परिस्थिति को दोष देने के बजाय कबीर का ध्यान करना। बुद्ध और महावीर से ज्यादा कारगर हैं कबीर। बुद्ध और महावीर थोड़े-से लोगों के काम के हो सकते हैं। कबीर राजपथ हैं। बुद्ध का मार्ग बड़ा संकीर्ण है; उसमें थोड़े ही लोग पा सकेंगे, पहुंच सकेंगे। बुद्ध और महावीर की भाषा भी उन्हीं की है--चुने हुए लोगों की। एक-एक शब्द बहुमूल्य है; लेकिन एक-एक शब्द सूक्ष्म है। कबीर की भाषा सबकी भाषा है--बेपढ़े-लिखे आदमी की भाषा है। अगर तुम कबीर को न समझ पाए, तो तुम कुछ भी न समझ पाओगे। कबीर को समझ लिया, तो कुछ भी समझने को बचता नहीं और कबीर को तुम जितना समझोगे, उतना ही तुम पाओगे कि मुक्ति का कोई भी संबंध परिस्थिति से नहीं। मुक्ति तुम्हारी भीतर की अभीप्सा पर निर्भर है--और कहीं भी घट सकता है; झोपड़े में, महल में, बाजार में, हिमालय पर; पढ़ी-लिखी बुद्धि में, गैर-पढ़ी-लिखी बुद्धि में, गरीब को, अमीर को; पंडित को, अपढ़ को; कोई परिस्थिति का संबंध नहीं है।       

पागल मन का पागलपन

बावरा मन निकला था, एक अधूरा ख्वाब लिए,
भीड़ भरे इस जग में, खुद से ही सवाल लिए।

कभी शांति की तलाश में, कभी प्रेम के जाल में,
खुद को ही ढूंढता रहा, अपने ही बवंडर हाल में।

ये प्यास भी अजीब है, बुझती नहीं किसी रीत से,
ये आस भी बावरी है, जुड़ती नहीं किसी प्रीत से।

जब थक कर बैठा मन, सन्नाटे की छांव में,
तब जाना—जिसे ढूंढा, वो था अपने ही गाँव में।

पुत्र वैभव के लिए

एक ऐसा पुरुष बनना तुम— जो विपरीत परिस्थितियों में परुष हो, जो अपने हालातों को दोष देने के बजाय उन्हें बदलने की आदत रखता हो। जिसके कदमों में ...