कोरोना काल में शिक्षा के माध्यम से मानवीय जीवन के पक्षों को जानने और उनके विकास की अभिलाषा
पुत्र वैभव के लिए
कबीर का अहंकार
कबीर के जीवन का एक सूत्र है मुक्ति। सूत्र का अर्थ अत्यंत संक्षिप्त, सारगर्भित और गूढ़ ज्ञान प्रदान करने वाला नियम या धागा है, जो बड़ी बातों को कम शब्दों में समझाता है। यह ज्ञान को पिरोने वाला (धागे की तरह) आधार है।
जिसमें अर्थ की गहराई और अध्यात्म की ऊंचाई दोनों अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त है। कबीर और रविदास, एक ही गुरु के शिष्य काशी के निवासी, सड़क वासी।
कबीर से ज्यादा साधारण आदमी संसार में खोजना कठिन है और अगर कबीर मुक्ति तक पहुंच सकते हैं, तो हम सभी पहुंच सकते हैं।
क्या काशी क्या ऊसर मगहर,
राम हृदय बस मोरा।
जो कबीरा काशी मरै
रामै कौन निहोरा।।
कबीर निपट अनपढ़ और गंवार हैं,
मसि कागद छूवों नहीं, कलम गहो नहिं हाथ।
इसलिए गंवार के लिए भी आशा है; मुक्ति की।
कबीर की जाति-पांति का तो ठिकाना है लेकिन ठौर नहीं है – हिंदू के गर्भ से पैदा हुए, मुसलमान के घर पले बढ़े। वह प्रेम की पैदाइश थे “ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पण्डित होय” जाति-पांति से परमात्मा का कुछ लेना-देना नहीं है।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।
कबीर जीवन भर गृहस्थ रहे--जुलाहे-बुनते रहे कपड़े और बेचते रहे;
साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाये॥
वो हिमालय नहीं गये क्योंकि उनका परमात्मा घर पर भी आ सकता है,
नैना अंतरि आव तूं, ज्यूं हौं नैन झंपेऊँ |
ना हौं देखौं और कूं , ना तुझ देखन देऊँ ||17 ||
हिमालय जाना आवश्यक नहीं। कबीर ने काशी ही नहीं, कुछ भी नहीं छोड़ा और सब कुछ पा लिया घर बैठे।
बहुत दिनन थैं मैं प्रीतम पाये, भाग बड़े घरि बैठे आये॥
इसलिए कबीर की दृष्टि में छोड़ना पाने की शर्त नहीं हो सकती। कबीर के पास एक साधारण-सी पत्नी है, और जान गये कि सब राग-रंग, सब वैभव-विलास, सब सौंदर्य मन की ही कल्पना है।
कबीर के अनुसार जब मन के अंदर से अहंकार, लोभ, मोह, और भय खत्म हो जाएँ—वही असली मुक्ति है।
मरने के बाद कुछ मिलने का इंतज़ार करना उनके अनुसार भागना है, समाधान नहीं।
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं”
मतलब—जब तक “मैं” (अहंकार) था, तब तक ईश्वर नहीं दिखा।
जैसे ही “मैं” खत्म हुआ, वही मुक्ति है।
कबीर ने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया- और जिसने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया उसका बड़ा भरोसा बढ़ता है। तब इस दुनिया में अगर तुम वंचित हो तो अपने ही कारण वंचित हो, परिस्थिति को दोष मत देना। जब भी परिस्थिति को दोष देने का मन में भाव उठे, कबीर का ध्यान करना। कम से कम मां-बाप का तो तुम्हें पता है, घर-द्वार तो है, तालाब के किनारे पैदा होते ही फेंके तो नहीं गए। हस्ताक्षर तो कर ही लेते हो। थोड़ी-बहुत शिक्षा हुई है, हिसाब-किताब रख लेते हो। वेद, कुरान, गीता भी थोड़ी पढ़ी है। न सही बहुत बड़े पंडित, छोटे-मोटे पंडित तो तुम भी हो ही। तो जब भी मन होने लगे परिस्थिति को दोष देने के बजाय कबीर का ध्यान करना। बुद्ध और महावीर से ज्यादा कारगर हैं कबीर। बुद्ध और महावीर थोड़े-से लोगों के काम के हो सकते हैं। कबीर राजपथ हैं। बुद्ध का मार्ग बड़ा संकीर्ण है; उसमें थोड़े ही लोग पा सकेंगे, पहुंच सकेंगे। बुद्ध और महावीर की भाषा भी उन्हीं की है--चुने हुए लोगों की। एक-एक शब्द बहुमूल्य है; लेकिन एक-एक शब्द सूक्ष्म है। कबीर की भाषा सबकी भाषा है--बेपढ़े-लिखे आदमी की भाषा है। अगर तुम कबीर को न समझ पाए, तो तुम कुछ भी न समझ पाओगे। कबीर को समझ लिया, तो कुछ भी समझने को बचता नहीं और कबीर को तुम जितना समझोगे, उतना ही तुम पाओगे कि मुक्ति का कोई भी संबंध परिस्थिति से नहीं। मुक्ति तुम्हारी भीतर की अभीप्सा पर निर्भर है--और कहीं भी घट सकता है; झोपड़े में, महल में, बाजार में, हिमालय पर; पढ़ी-लिखी बुद्धि में, गैर-पढ़ी-लिखी बुद्धि में, गरीब को, अमीर को; पंडित को, अपढ़ को; कोई परिस्थिति का संबंध नहीं है।
पागल मन का पागलपन
पुत्र वैभव के लिए
एक ऐसा पुरुष बनना तुम— जो विपरीत परिस्थितियों में परुष हो, जो अपने हालातों को दोष देने के बजाय उन्हें बदलने की आदत रखता हो। जिसके कदमों में ...
-
दोहावली हरे चरहिं तपही बरे जरत फरे पसारहिं हाथ | तुलसी स्वारथ मीत सब परमार्थ रघुनाथ || 1 भावार्थ:- अर्थात तुलसीदास जी ने कहा है कि जब घोर ...
-
प्रश्न-पत्र में संस्कृत के पाठों (गद्य व पद्य) से दो गद्य और व श्लोक दिए जाते हैं, जिसमें से एक गद्य पाठ व एक श्लोक का सन्दर्भ सहित हिंदी मे...
-
प्रशिक्षित स्नातक विषय- कला /L T Art हेतु पठनीय पुस्तकें 1 - भारतीय कला और कलाकार - लेखक कुमारिल स्वामी 2 - भारतीय चित्रकला का ...