मर्द की थकी हुई मुस्कान






सुबह-सुबह फिर निकल पड़ा वो,
कंधों पर संसार लिए,
अपने हिस्से धूप न माँगी,
सबके लिए बहार लिए।

घर की खुशियों की खातिर ही,
हर दर्द दबाना पड़ता है,
मर्द को अक्सर हँसते-हँसते
अंदर से मरना पड़ता है।

माँ की दवा, बच्चे की फीस,
बाप की उम्मीदें साथ,
पत्नी के सपनों की खातिर
चलता रहता दिन और रात।

अपने जख्म छुपाकर वो तो
सबको हिम्मत देता है,
टूटी चप्पल, थका बदन फिर
रोटी का वादा देता है।

कौन समझता उसकी चुप्पी,
कौन पढ़े मन की भाषा,
सबको बस मजबूत दिखे वो,
भीतर टूटी हर आशा।

रोना चाहे तो भी आखिर
आँसू पी जाना पड़ता है,
मर्द को अक्सर किस्मत से
हर दिन लड़ जाना पड़ता है।

ना कोई माला, ना ताली,
ना कोई सम्मान मिला,
बस जिम्मेदारी के बदले
जीवन भर का काम मिला।

फिर भी चेहरे पर मुस्कानें
घर की खातिर रखता है,
अपने सपनों की चिता पर
सबका भविष्य लिखता है।

ईश्वर उससे पूछे एक दिन —
“थककर आखिर क्या पाया?”
वो हँसकर बस इतना बोले —
“अपनों को खुश देख पाया।”

यही जीत है, यही कमाई,
यही उसका अभिमान रहा,
दुनिया चाहे कुछ भी समझे,
मर्द सदा बलिदान रहा।

— प्रमोद कुमार सिंह

तुम दिल में रहो

“तुम दिल में रहो” 

💞
रिश्ता बनाया है तो निभाएँगे,
हर मोड़ पे साथ ही आएँगे।
तुमसे ही रूठेंगे हम कभी,
तुमको ही फिर से मनाएँगे।।
🌸
तुम दिल में रहो इतना ही बहुत,
साँसों में महकते रहना तुम।
दूरी चाहे जितनी भी हो,
आँखों में चमकते रहना तुम।।

💞
तुमसे बातें, तुमसे शिकवे,
तुमसे ही हर अफ़साना है।
भीड़ भरी इस दुनिया में,
बस तेरा साथ सुहाना है।।

💞
कभी हँसी बनकर आ जाना,
कभी आँसू बन बह जाना।
अगर कभी हम खो भी जाएँ,
तुम बनकर राह दिखाना।।

💞
मुलाक़ातों की चाह नहीं,
बस एहसास तुम्हारा काफी है।
दिल के इस छोटे से घर में,
एक नाम तुम्हारा काफी है।।

💞
तुमसे ही लड़ना अच्छा लगे,
तुमसे ही प्यार जताएँगे।
ये रिश्ता साँसों जैसा है,
मरते दम तक निभाएँगे।।
💞
तुम दिल में रहो इतना ही बहुत,
मिलने की कोई ज़रूरत नहीं।
कुछ रिश्ते रूह में बसते हैं,
उनकी कोई दूरी नहीं।।
— प्रमोद कुमार सिंह द्वारा प्रस्तुति

प्रकृति रोती है

फूल समझते तितली का दु:ख, खुद को चूस जाने देते।

पत्ते समझते पेड़ का दु:ख खुद, को झर जाने देते।

पहाड़ समझते नदियों का दु:ख, खुद को पीस जाने देते।

बाती समझती दीपक का दु:ख, खुद को जल जाने देती।

आसमान समझता धरती का दु:ख, खुद को बरस जाने देता।

सूरज समझता रात का दु:ख, खुद को जल जाने देता।

धागा समझता माला का दुख, खुद को बन्ध जाने देता।

साज समझता राग का दुख, खुद को बज जाने देता।

पर देखो विधि का कैसा खेल, कैसा ये संसार है,

मानव ही न समझे मानव का दुःख, ये कैसा व्यवहार है? 


दिल सीने में धड़कता नहीं, आंखों में नमी नहीं,

दूसरे के जख्मों पर मरहम रखने की कमी नहीं। 


पास बैठे हैं पर कोसों दूर, बातें हैं पर मौन है,

आंसू गिरें तो हंसी उड़े,  ये कैसा दौर है? 


इसीलिए तो तोड़ा मैंने जग से नाता सारा,  

जब मेरे किस्से का हर किरदार निकला गद्दारा।


अब समझ गया हूं मैं जग का सारा लेखा-जोखा,

कि प्रकृति रोती है साथ में, सबका दुःख है धोखा।


पर इंसान हंसता है लाश पे, जश्न मनाता मातम में, 

इसीलिए तो त्याग दिया मोह, जी रहा हूं खातम में।

पर मानव न समझे मानव का दु:ख, दिल है पर धड़कता ही नहीं।

मानव दूसरे के दुःख में सिहरता नहीं।

कोई बात बने


कोई बात बने

मेरे लिखने से क्या, जो तुम ना पढ़ो,  
तुम पढ़ लो जरा तो कोई बात बने।

मेरे सोचने से क्या, जो तुम ना समझो,  
तुम समझ लो जरा तो कोई बात बने।

मैं चुप रहूं तो क्या, जो तुम ना बोलो,  
तुम बोल दो जरा तो कोई बात बने।

मैं फूल बनूं तो क्या, जो महक ना आए,  
तुम खुशबू बनो तो कोई बात बने।

मेरे चाहने से क्या, जो एहसास ना हो,  
तुम महसूस करो तो कोई बात बने।

मैं बेरंग रहूं तो क्या, जो तुम ना रंगो,  
तुम रंग भरो तो कोई बात बने।

मेरे हाथ बढ़े तो क्या, तुम रुके रहो,  
तुम भी हाथ बढ़ाओ तो कोई बात बने...!!


मनमीत


आप प्रेम हो, प्रीत हो, मनमीत हो हमारे,  
सूने समरस जीवन में संगीत हो हमारे।  
धड़कन-धड़कन में बसा नाम है आपका,  
श्वास-श्वास की सरगम में गीत हो हमारे।

थक कर जब निगाहें राहों में खो जाएं,  
आप ही जीत हो, आप ही हार हो हमारे।  
अंधियारों में बनकर उजाला आप आए हो, 
प्रत्येक नव प्रभात का त्योहार हो हमारे।

मन के मरुस्थल में बन फूल आप महको,  
सपनों की डाली पर सँजे ख्वाब हो हमारे।
एहसासों से जीवन को सजा दिया तुमने,  
आप बिन सूने थे सब किस्से-प्यार के हमारे।

साथ हो तो लगता हर पीड़ा मधुर है,  
आप बिन अधूरी हर इक रीत हो हमारी।  
आपसे ही भरते हैं हर घाव हमारे,  
आप ही मन भाव और संसार हो हमारे।  

दूर जाओ तो विरह भी रीत सिखाए,  
आप बिन हर पल लगता अतीत हो हमारे।
लौट आओ तो खुशबू से भर जाए जग,  
शून्य में आप ही चांद और तारे हो हमारे। 

आप प्रेम हो, प्रीत हो, मनमीत हो हमारे,  
इस जन्म नहीं, हर जन्म मीत हो हमारे।  
रहना यूं ही हरदम इस दिल के पास आप,  
जीवन की हर डगर में आधार हो हमारे।


आंचल सा स्पर्श

🌙

आंचल सा स्पर्श

वो हारा हुआ नहीं था, 
बस थका हुआ था बहुत... 
दुनिया की जंग लड़ते-लड़ते 
कंधे झुक गए थे चुपचाप।

फिर अचानक 
उसके कंधे पर एक हाथ रखा गया 
न बोली कुछ, न पूछा हाल 
बस रख दिया... जैसे रख देती है 
माँ, बिलखते बच्चे पर आंचल।

उस एक कोमल स्पर्श में 
सारे युद्ध हार जाना कबूल था,
सारी मर्दानगी पिघल जाना मंजूर था। 

क्योंकि हताश पुरुष को 
मनचाही स्त्री का हाथ 
समंदर में डूबते को 
किनारा सा लगता है...।

वो पल में बच्चा हो गया 
और उसकी हथेली 
पूरी कायनात हो गई।


प्रेम सरोवर

जानते हो …
प्रेम एक बार उतर जाए तो
सिर्फ़ याद नहीं बनता,
वह आदत, 
आदर और आत्मा का हिस्सा हो जाता है।

वह चला भी जाए
तो भीतर एक कमरा छोड़ जाता है
जहाँ स्मृतियाँ साँस लेती रहती हैं।

प्रेम की मृत्यु दरअसल
पूर्ण अंत नहीं होती,
वह हमें थोड़ा-सा अधूरा छोड़ जाती है।

हर बार जब प्रेम मरता है,
हम जीते तो रहते हैं…
पर भीतर कहीं
एक धड़कन हमेशा के लिए
चुप हो जाती है।

…और सच ये है—
वही चुप धड़कन
हमें उम्र भर सुनाई देती रहती है।

हम हँसते हैं, मिलते हैं, आगे बढ़ते हैं,
पर किसी मोड़ पर अचानक
वो नाम फिर से दिल में उतर आता है।

नया प्रेम आता भी है तो
पुराने की जगह नहीं लेता,
बस उसके बगल में
एक और कमरा बना देता है।

और इंसान…
पूरा कभी नहीं भरता फिर,
बस जीना सीख जाता है
उन अधूरे कमरों के साथ।

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मर्द की थकी हुई मुस्कान

सुबह-सुबह फिर निकल पड़ा वो, कंधों पर संसार लिए, अपने हिस्से धूप न माँगी, सबके लिए बहार लिए। घर की खुशियों की खातिर ही, हर दर्द द...