प्रकृति रोती है

फूल समझते तितली का दु:ख, खुद को चूस जाने देते।

पत्ते समझते पेड़ का दु:ख खुद, को झर जाने देते।

पहाड़ समझते नदियों का दु:ख, खुद को पीस जाने देते।

बाती समझती दीपक का दु:ख, खुद को जल जाने देती।

आसमान समझता धरती का दु:ख, खुद को बरस जाने देता।

सूरज समझता रात का दु:ख, खुद को जल जाने देता।

धागा समझता माला का दुख, खुद को बन्ध जाने देता।

साज समझता राग का दुख, खुद को बज जाने देता।

पर देखो विधि का कैसा खेल, कैसा ये संसार है,

मानव ही न समझे मानव का दुःख, ये कैसा व्यवहार है? 


दिल सीने में धड़कता नहीं, आंखों में नमी नहीं,

दूसरे के जख्मों पर मरहम रखने की कमी नहीं। 


पास बैठे हैं पर कोसों दूर, बातें हैं पर मौन है,

आंसू गिरें तो हंसी उड़े,  ये कैसा दौर है? 


इसीलिए तो तोड़ा मैंने जग से नाता सारा,  

जब मेरे किस्से का हर किरदार निकला गद्दारा।


अब समझ गया हूं मैं जग का सारा लेखा-जोखा,

कि प्रकृति रोती है साथ में, सबका दुःख है धोखा।


पर इंसान हंसता है लाश पे, जश्न मनाता मातम में, 

इसीलिए तो त्याग दिया मोह, जी रहा हूं खातम में।

पर मानव न समझे मानव का दु:ख, दिल है पर धड़कता ही नहीं।

मानव दूसरे के दुःख में सिहरता नहीं।

कोई बात बने


कोई बात बने

मेरे लिखने से क्या, जो तुम ना पढ़ो,  
तुम पढ़ लो जरा तो कोई बात बने।

मेरे सोचने से क्या, जो तुम ना समझो,  
तुम समझ लो जरा तो कोई बात बने।

मैं चुप रहूं तो क्या, जो तुम ना बोलो,  
तुम बोल दो जरा तो कोई बात बने।

मैं फूल बनूं तो क्या, जो महक ना आए,  
तुम खुशबू बनो तो कोई बात बने।

मेरे चाहने से क्या, जो एहसास ना हो,  
तुम महसूस करो तो कोई बात बने।

मैं बेरंग रहूं तो क्या, जो तुम ना रंगो,  
तुम रंग भरो तो कोई बात बने।

मेरे हाथ बढ़े तो क्या, तुम रुके रहो,  
तुम भी हाथ बढ़ाओ तो कोई बात बने...!!


मनमीत


आप प्रेम हो, प्रीत हो, मनमीत हो हमारे,  
सूने समरस जीवन में संगीत हो हमारे।  
धड़कन-धड़कन में बसा नाम है आपका,  
श्वास-श्वास की सरगम में गीत हो हमारे।

थक कर जब निगाहें राहों में खो जाएं,  
आप ही जीत हो, आप ही हार हो हमारे।  
अंधियारों में बनकर उजाला आप आए हो, 
प्रत्येक नव प्रभात का त्योहार हो हमारे।

मन के मरुस्थल में बन फूल आप महको,  
सपनों की डाली पर सँजे ख्वाब हो हमारे।
एहसासों से जीवन को सजा दिया तुमने,  
आप बिन सूने थे सब किस्से-प्यार के हमारे।

साथ हो तो लगता हर पीड़ा मधुर है,  
आप बिन अधूरी हर इक रीत हो हमारी।  
आपसे ही भरते हैं हर घाव हमारे,  
आप ही मन भाव और संसार हो हमारे।  

दूर जाओ तो विरह भी रीत सिखाए,  
आप बिन हर पल लगता अतीत हो हमारे।
लौट आओ तो खुशबू से भर जाए जग,  
शून्य में आप ही चांद और तारे हो हमारे। 

आप प्रेम हो, प्रीत हो, मनमीत हो हमारे,  
इस जन्म नहीं, हर जन्म मीत हो हमारे।  
रहना यूं ही हरदम इस दिल के पास आप,  
जीवन की हर डगर में आधार हो हमारे।


आंचल सा स्पर्श

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आंचल सा स्पर्श

वो हारा हुआ नहीं था, 
बस थका हुआ था बहुत... 
दुनिया की जंग लड़ते-लड़ते 
कंधे झुक गए थे चुपचाप।

फिर अचानक 
उसके कंधे पर एक हाथ रखा गया 
न बोली कुछ, न पूछा हाल 
बस रख दिया... जैसे रख देती है 
माँ, बिलखते बच्चे पर आंचल।

उस एक कोमल स्पर्श में 
सारे युद्ध हार जाना कबूल था,
सारी मर्दानगी पिघल जाना मंजूर था। 

क्योंकि हताश पुरुष को 
मनचाही स्त्री का हाथ 
समंदर में डूबते को 
किनारा सा लगता है...।

वो पल में बच्चा हो गया 
और उसकी हथेली 
पूरी कायनात हो गई।


प्रेम सरोवर

जानते हो …
प्रेम एक बार उतर जाए तो
सिर्फ़ याद नहीं बनता,
वह आदत, 
आदर और आत्मा का हिस्सा हो जाता है।

वह चला भी जाए
तो भीतर एक कमरा छोड़ जाता है
जहाँ स्मृतियाँ साँस लेती रहती हैं।

प्रेम की मृत्यु दरअसल
पूर्ण अंत नहीं होती,
वह हमें थोड़ा-सा अधूरा छोड़ जाती है।

हर बार जब प्रेम मरता है,
हम जीते तो रहते हैं…
पर भीतर कहीं
एक धड़कन हमेशा के लिए
चुप हो जाती है।

…और सच ये है—
वही चुप धड़कन
हमें उम्र भर सुनाई देती रहती है।

हम हँसते हैं, मिलते हैं, आगे बढ़ते हैं,
पर किसी मोड़ पर अचानक
वो नाम फिर से दिल में उतर आता है।

नया प्रेम आता भी है तो
पुराने की जगह नहीं लेता,
बस उसके बगल में
एक और कमरा बना देता है।

और इंसान…
पूरा कभी नहीं भरता फिर,
बस जीना सीख जाता है
उन अधूरे कमरों के साथ।

........ ✍️

भ्रम छोड़ दीजिए




"भ्रम छोड़ दीजिए"
ये मिट्टी के घर भी सिखाते हैं,  
हर दीवार दरकती है, हर छत टपकती है।  
फिर क्यों हम रिश्तों को पत्थर की लकीर मान लें?

जो कल तक अपना था, आज पराया है,  
जो हंसकर मिला था, वो ताना सुनाया है।  
तो इस भ्रम को भी अब जाने दीजिए,  

कि सब अपने हैं... ये मानना छोड़ दीजिए।

खुश रहना है तो दिल का बोझ हल्का करिए,  
उम्मीदों की गठरी को थोड़ा सा झटका करिए।  
जो साथ है उसका शुक्रिया करिए,  
जो चला गया... उसे अलविदा करिए।

टूटे घर में भी धूप आती है मित्र,  
बस खिड़की खोलिए, और भ्रम छोड़ दीजिए।



भावना का मिलन

कई बार जीवन में हम जाने अनजाने में ही अपनी खुशियों को किसी और की भावनाओं से बाँध लेते हैं।

ऐसा लगता है जैसे हमारे भीतर का मौसम अब हमारे नियंत्रण में नहीं रहा।
अगर वह उदास है, तो हमारे अंदर भी एक अजीब सी बेचैनी छा जाती है।
और अगर उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठे, तो हमारे दिल के कोने-कोने में रोशनी फैल जाती है।

फिर समझ आता है कि शायद हम “खुश रहना” नहीं, बल्कि “किसी और के ठीक होने से खुश होना” सीख लेते हैं।

यह एक अनोखा सा संबंध है,जहाँ दो आत्माएँ शब्दों से नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ जाती हैं।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी जन्म लेता है:
क्या हम अपनी खुशी को इतना बाहर रख दें कि वह किसी और के मनोभावों पर निर्भर हो जाए?

शायद असली यात्रा यही है,
प्यार करते हुए भी अपनी रोशनी को भीतर संजोकर रखना।

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प्रकृति रोती है

फूल समझते तितली का दु:ख, खुद को चूस जाने देते। पत्ते समझते पेड़ का दु:ख खुद, को झर जाने देते। पहाड़ समझते नदियों का दु:ख, खुद को पीस जाने देत...