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आंचल सा स्पर्श
वो हारा हुआ नहीं था,
बस थका हुआ था बहुत...
दुनिया की जंग लड़ते-लड़ते
कंधे झुक गए थे चुपचाप।
फिर अचानक
उसके कंधे पर एक हाथ रखा गया
न बोली कुछ, न पूछा हाल
बस रख दिया... जैसे रख देती है
उस एक कोमल स्पर्श में
सारे युद्ध हार जाना कबूल था,
सारी मर्दानगी पिघल जाना मंजूर था।
क्योंकि हताश पुरुष को
मनचाही स्त्री का हाथ
समंदर में डूबते को
किनारा सा लगता है...।
वो पल में बच्चा हो गया
और उसकी हथेली
पूरी कायनात हो गई।
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