नए वर्ष का प्रारंभ कैसे एक नयी उमंग और नए जोश से करें-


 नए वर्ष का प्रारंभ कैसे एक नयी उमंग और नए जोश से करें-

            नए वर्ष के आने की प्रसन्नता को मनाने के बाद समय आता है, उस नए वर्ष के पहले दिन में किये गए उन सभी संकल्पों  पर काम करने का जिन्हें हम करना है।अगर आप अपने इस साल की सुन्दर शुरुआत करना चाहते हैं तो अपने-आप  को बदलने, अपनी ज़िन्दगी को और सुन्दर  बनाने और अपने लक्ष्यों और आकांक्षाओं को महत्व देने के बारें में अवश्य सोचें | इसके लिए एक स्वस्थ दिनचर्या अपनाएं और अपने साथ  अपने आस-पास के लोगों की ज़िन्दगी में खुशियां लाने की कोशिश करें | मनुष्य की ज़िन्दगी में एक सार्थक कार्यक्रम होना जरुरी है ताकि हर काम को उसकी अहमियत मिलें इसके साथ-साथ ज़िन्दगी में सकारात्मक रहना भी बहुत जरूरी है | ऐसा करने से आपकी जीवन में तो खुशियां आएँगी ही, साथ में आपके आस-पास के लोग भी इस आनन्द का अनुभव कर सकेंगे | आपके छोटे-छोटे कदम आपके अलावा किसी और  की ज़िन्दगी में एक बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं | आप जीवन के लिए क्या दृष्टिकोण रखते हैं ये पूरी तरह आप पर निर्भर करता है, लेकिन नए साल की आरम्भ एक नयी सोच, नयी उमंग और ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए करें | अच्छा महसूस करें अच्छा होगा !


  यदि सचमुच नये साल को सार्थक करना है, तो जरूरी है कि कुछ तो ऐसे नए की शुरूआत करें कि पूरा साल अपने पिछले साल की तुलना में नया बनकर हमारे जीवन में कुछ नया जोड़े अन्यथा तो यह भी साल, जो अभी तक नया नजर आ रहा है, कुछ समय बाद पुराना पड़कर पिछले जैसा ही हो जाएगा। क्या आपको नहीं लगता अब तक हम अपनी जिन्दगी को कुछ इसी तरह आगे बढ़ा रहे थे?


वस्तुतः नये वर्ष के स्वागत का अर्थ है – एक नई चेतना, एक नया भाव, एक नया संकल्प, कुछ ऐसा नया करने की प्रतिज्ञा, जो अब तक नहीं किया और कुछ ऐसा छोड़ने का भाव कि जिसके साथ चलना मुश्किल हो गया है। ऐसा करके ही हम नए वर्ष का सच्चे अर्थों में स्वागत कर सकते हैं।


सच तो यही है कि नया वर्ष, नया संकल्प लेने का एक अवसर होता है, एक ऐसा संकल्प, जिसे हम लगातार साल भर तक निभाते रहें और जब किसी संकल्प को लगातार साल भर तक निभाया जाता है, तो वही हमारी आदत बन जाती है। यही आदत हममें कुछ इस तरह घुल-मिल जाती है कि वही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। इसलिए जरूरी है कि हम इस अवसर पर कोई एक या अनेक संकल्प लें। चाहे वह संकल्प कितना भी छोटा क्यों न हो।



यह संकल्प बहुत विचारपूर्वक और पूरे स्थिर मन से लिया जाना चाहिए और यदि एक बार ले लिया गया है, तो उसे किसी भी कीमत पर पूरा किया ही जाना चाहिए। इस तरह के संकल्प कई प्रकार के हो सकते हैं, जैस –


  • मैं प्रतिदिन सुबह जल्दी उठूँगा।

  • मैं दिन का प्रारम्भ ईश्वर वंदना के साथ करूंगा।

  • मैं प्रतिदिन कम से कम 45 मिनट स्वस्थ्य पर दूँगा।

  • मैं प्राणीमात्र की सेवा के लिए प्रतिबद्ध रहूँगा।

  • मैं किसी भी काम को टालूँगा नहीं, बल्कि तुरन्त कर डालूँगा।

  • मैं लोगों के साथ अपने संबंधों को बहुत महत्व दूँगा।

  • मैं प्रतिदिन कम से कम चार घण्टे पढूँगा ही। आदि-आदि।

हम सभी अनेक प्रकार की कमजोरियों से भरे हुए होते हैं। यह दावा करना बिल्कुल गलत होगा कि ‘मेरे अन्दर कोई अवगुण नहीं है। ‘ मुझे लगता है कि नये वर्ष में हमें अपने संकल्पों में एक संकल्प यह भी जोड़ लेना चाहिए कि ‘मैं अपने किसी एक अवगुण विशेष की समाप्त करूँगा।‘  इस तरह के कुछ संकल्प निम्न हो सकते हैं –


  • मैं अपने क्रोध को नियंत्रित करूँगा।

  • मैं आलस्य से मुक्त होऊँगा।

  • मुझे अपने अन्दर के ईर्ष्या के भाव को समाप्त करना है।

  • मैं अपनी बुराइयों को नष्ट करूँगा, जैसे – सिगरेट पीना, तम्बाकू खाना, शराब पीना,मोबाइल पर अधिक समय देना आदि-आदि।

इस प्रकार सकारात्मक और नकारात्मक संकल्प आपके व्यक्तित्व को दो तरफा विकसित करने का काम करेंगे। पहला तो यह कि वे उसमें कुछ अच्छी आदतों को जोड़कर उसे चमकदार बनाएँगे। दूसरा यह कि वे उसके धब्बेदार तत्वों को हटाकर अपने व्यक्तित्व को नई आभा प्रदान करेंगे।



एक स्वस्थ्य दिनचर्या का पालन करें: स्वास्थ्य से ही भौतिक और आध्यात्मिक जीवन का लाभ उठाया जा सकता है।अपने स्वास्थ्य के बारें में सोचें और उससे सम्बंधित नियम बनाएं जिसमे अपने सभी लक्ष्यों के बारें में सोचें और उन्हें पाने के लिए तन-मन-धन से भरपूर प्रयास करें | बिस्तर को छोड़ने के साथ ही ईश्वर और अपने पूर्वजों को धन्यवाद ज्ञापित करें। फिर अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए दैनिक क्रिया को करने के बाद स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य को प्रथमिकता दे। सबसे पहले एक लक्ष्य बनाए । उदहारण के लिए आपको कुछ महीनों बाद 10 किलोमीटर दौड़ने का लक्ष्य अपने सामने रखना है तो सबसे पहले 5 मिनट रस्सी कूदने से आरंभ करें और समय को बढ़ाते जाए साथ ही छोटी दूरियों को तेज चाल के साथ तय करे, चढ़ने के लिए लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें और आप स्कूल, कालेज या ऑफिस आते-जाते समय प्रत्येक दिन 20 से 30 मिनट पैदल तेज चाल चले करें ताकि आप अपने  लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकें। आप बहुत ही साधारण और सरल लक्ष्यों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ें | इस नियम का यदि आप पालन करते है तो आप इस क्षेत्र में नए है या पुराने कोई फर्क नहीं पड़ता।

हाँ इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि एक ही दिन में पूरे हफ्ते/ महीने या साल की कसरत करने का प्रयास कदापि  न करें |

     अगर आप  स्वस्थ्य शरीर के प्रेमी है तो अपने समक्ष  ऐसे लक्ष्य रखें जो आपको सदैव प्रेरणा देते रहें जैसे डिप्स को बढ़ाना, क्रंच बढ़ाना, बाइसेप तथा ट्राइसेप तथा कमर की चर्बी को कम करना  और फिर वर्ष के अंत तक हठ योग की कुछ कठिन क्रियाओं का दिनचर्या में शामिल होना ।

 


अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना:-

अपनी ज़िन्दगी में सेवा, प्रेम, प्रसन्नता, सहृदयता  के लिए सबका कृतज्ञता व्यक्त करें: जब आप उन लोगों के प्रति कृतज्ञता  व्यक्त करते हैं जिन्होंने किसी न किसी रूप में आपकी सहायता की हो तो आप मन और मस्तिष्क से अच्छा महसूस करते हैं और आपका ज़िन्दगी को देखने की दृष्टि बदल जाती है | हर चीज़ सुंदर दिखने लगने लगती है | साथ ही साथ जिसने आपकी सहायता या सेवा की है, वो व्यक्ति भी आपकी कृतज्ञता के फलस्वरूप आपके निकट आता है।आप अपने अंदर भी सेवाभाव पैदा करे क्योंकि सेवा मोलभाव की मंडी नहीं, परमार्थ की पगडंडी है। निस्वार्थ सेवा दरअसल मानवता की पहचान है। प्रतिदिन जगने के साथ और सोने के पूर्व ईश्वर और माता-पिता और गुरु का आभार प्रकट करे।

        अपने हर दिन के लिए एक सकारात्क बात सोचें: सकारात्मक बात वह हो सकती है जो हमको हर पल जीने की सही दिशा और दशा प्रदान करती हैं और जब आप या हम  एक सकारात्मक सोच के साथ दिन की प्रारंभ करते हैं तो सकारात्मक सोच हमारे आत्मसम्मान को बढ़ावा देने के साथ कुछ अच्छा करने का साहस देता है | तो कुछ इस तरह ही हो नए वर्ष का प्रारंभ ! हर दिन एक नए विचार के साथ शुरू करें जैसे "मैं एक योग्य व्यक्ति  हूँ" या "मुझमें चुनौतियों का सामना करने की साहस हैं" "ये कार्य मुझसे जरूर होगा" ऐसी सकारात्क सोच को हमेशा अपने दिमाग में रखें और किसी भी चुनौती के सामने नतमस्तक होने की बजाय उसका डट कर सामना करें |

       ध्यान रहें हर दिन चुनी गयी सकारात्मक विचार आपकी ज़िन्दगी और परिस्थितिओं के हिसाब से होनी चाहिए जैसे अगर आपका कोई दोस्त मुसीबत में है या फिर उसे आपकी मदद की जरुरत है तो सोचें "मैं एक सच्चा और अच्छा दोस्त हूँ |"

       जब भी हो सके, नेक और अच्छे काम करें: नेक या अच्छे काम वो होतें हैं जो किसी की ज़िन्दगी में छोटी या बड़ी ख़ुशी ला सके या फिर उनकी मदद हो सके और ये काम ये सोचकर कभी न करें कि बदले में आपका क्या फायदा होगा बल्कि बिना स्वार्थी हुए बस दूसरे के जीवन में उजाला करते रहें | नए साल को एक इस पुनीत भावना से शुरू करें क्योंकि किसी के दुःख को दूर करने में जो सुख है वह किसी और चीज़ में नहीं | 

     आप किसी को दिल से सच्ची प्रशंसा दे सकते हैं, दान-पुण्य कर सकते हैं या फिर किसी अनजान को देखकर मुस्कुराने से भी दिल को अच्छा महसूस होता है | इसे व्यवहार में लाये।


    भूखे कुत्ते को बिस्कुट खिलाना, गिलहरियों को मूंगफली खिलाना,कबूतर और गौरैयों को दाना देना,भूखे व्यक्ति को खाना खिलाना , गरीब छात्रों को फीस तथा पुस्तक उपलब्ध कराना जैसे अच्छे काम भी मन और मस्तिष्क को  शांति प्रदान करते हैं |


हौसले बुलंद रखें :-

' खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले

 खुदा बंदे से पूछे  बता तेरी रजा क्या है'

किसी क्षेत्र में विजय पाने के लिए मजबूत उत्साह की जरूरत है। यह उत्साह आपको अपने अंदर पैदा करने होंगे तभी तो आप दूसरों की उत्साहवर्द्धन भी कर सकेंगे और जिंदगी के कड़े मुकामों को आसानी से पार कर सकेंगे।



चुनौतियों को स्वीकार करें :-

' मुश्किलें दिल के इरादें आजमाती हैं, स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं,

हौसला मत हार गिरकर ओ मुसाफिर, ठोकरें इंसान को चलना सिखाती हैं।'

     जीवन में कोई भी कार्य करते हुए अगर हमारा लक्ष्य सकारात्मक और निःस्वार्थ है तो आगे बढ़ने के लिए मार्ग यूं ही आसान हो जाता है। कड़ी चुनौतियां भी फिर कुछ भी बिगाड़ नहीं सकतीं।


खुशियां देने का नियम बनाइए :-जिंदगी बहुत खूबसूरत है, मगर इसे दूसरों की जिंदगी में भी मिठास घोलते हुए बिताया जाए तो इसके मायने ही बदल जाते हैं। खुशियां देने से बढ़ती हैं, इसलिए देने का नियम बनाइए।

     छोटी-छोटी खुशियों को सहेजें :-कई बार हम बड़ी खुशियों की चाह में जीवन में आने वाली छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं। मगर कभी इन छोटी-छोटी खुशियों को सहेजकर देखिए आप पाएंगे कि बड़ी खुशियां स्वतः ही आपके पास चली आएंगी।


परिवार से जुड़ें रहें :-  ' रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ों चटकाए, टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए'

     आज की भागमभाग भरी जिंदगी में लोग लगातार परिवार से दूर होते जा रहे हैं। अगर समय मिलता भी है तो वह गिले-शिकवे में ही निकाल देते हैं। मगर यह नहीं जानते कि रिश्ते प्रेम की डोर होते हैं जिनमें गांठ पड़ने पर खुलना मुश्किल हो जाता है।



संभालकर बोलिए :-  शब्द संभालकर बोलिए,

" शब्द के हाथ न पांव रे, एक शब्द औषधि करे, एक करे है घाव रे"

शब्दों के बिना अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती। मगर इन शब्दों को कहने का तरीका भी समझना होगा, हर एक से मीठा बोलें क्योंकि गलत बोलने में तो समय नहीं लगता पर यह किसी को कितनी तकलीफ दे सकते हैं, उस पर विचार जरूरी है।


अपने आस-पास के वातावरण में सुधार लाएं:- अपने आस-पास की जगह और अपने घर को साफ़ रखें: हो सके तो नए साल के आने से पहले ही अपनी किताबें, कमरे आदि को साफ़-सुथरा करने की कोशिश करें | जब घर साफ़ होता है तो मन भी साफ़ रहता है | ऐसा सामान जो आप उपयोग नहीं करते उसे किसी जरूरतमंद को दें या खराब सामान को फेंक दें, कूड़े-कचरे को बाहर फेकें और सामान को सेट करें ताकि घर साफ़ और सुन्दर लगे | ऐसा करने से आप नए साल में साफ़-सुथरे तरीके से कदम रखें |

अपने वाहनों को भी साफ़ करने की कोशिश करें: साफ़-साफ़ शब्दों में कहा जाएँ तो अपने से जुडी हर चीज़ का ध्यान रखें और उसे साफ़ रखें क्योंकि फालतू का सामान फालतू सोच लाता है | घर में जरुरत से ज्यादा सामान रखने से मन हल्का महसूस नहीं करता | और सभी दराजों की सफाई पर थोड़ा वक़्त लगाएं |


फर्स्ट-एड किट- घर के अंदर एक फर्स्ट-एड-किट जरूर रखें। इसमें बुखार,दर्द,उल्टी, दस्त, पेट दर्द,ऐंटी एलर्जी के साथ पट्टी,रुई,पेपर टेप,सेवलान, बरनाल क्रीम आदि जरूर रखें।

टूल बॉक्स- घर के अंदर छोटे-मोटे कामों के लिए एक टूलबॉक्स जरूर रखें, जिसमें जिसमें टेस्टर, प्लास, पेंचकस,कुछ रिंच तथा टेप हो।


ज़िन्दगी के लक्ष्यों को निर्धारित करें

हर महीने किसी एक नयी चीज़ को करने का लक्ष्य रखें: अपने से जुड़े लक्ष्यों के अलावा हर महीने किसी ऐसे लक्ष्य को पाने की कोशिश करें जो आपके सुविधा क्षेत्र से बाहर हो | आप हर महीने किसी नयी चीज़ को करने का लक्ष्य रख सकते हैं या फिर कुछ चीज़ों को पाने का लक्ष्य बना सकते हैं और धीरे-धीरे उन्हें पाने की भरसक कोशिश कर सकते हैं | कुछ ऐसा करने की सोचें जो आपने पहले कभी न किया हो या आपके लिए बिल्कुल नया हो | ऐसा करने से आप ज़िन्दगी में आगे बढ़ते हैं और सफलता को पा सकते हैं | 

किसी नयी चीज़ को प्रयास करना बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप खाने की किसी चीज़ को पहली बार खाने का प्रयास करते हैं |

आप किसी सक्रिय गतिविधियों का प्रयास कर सकते हैं जैसे नयी लैंग्वेज को सीखना, मैडिटेशन क्लास ज्वाइन करना या फिर पहाड़ी यात्रा पर जाना |

4 से 6 चीज़ों की एक लिस्ट बनाएं जो आप इस नए साल में करना चाहते हैं: साल के शुरुआत में ही एक नोटबुक लेकर उन सभी चीज़ों की सूची बनाएं जो आप पूरे साल में  करना चाहते हैं | कुछ आसान और साधारण लक्ष्य अपने सामने रखें जैसे ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियां खाना या वजन कम करना | धीरे-धीरे अपनी उस लिस्ट में छोटे-छोटे लक्ष्य जोड़ते रहें और जैसे-जैसे आप लक्ष्यों को पाते जाएँ अपनी सूची में से इन्हे टिक करते जाएँ | जब आप अपने लक्ष्यों को लिखते हैं तो वह आपके सामने हमेशा रहता हैं और आपको इनकी याद दिलाता रहता है | 

इस सूची की सहायता से आपको हर महीने नयी चीज़ें प्रयास करने के बहुत से विचार मिल सकते हैं |

आप अपनी इच्छासूची  में ये सभी विचार लिख सकते हैं - जैसे-खाना पकाना सीखना,शरीर बनाना सीखना, तैराकी सीखना, टाईपिंग सीखना, कोडिंग सीखना आदि।

अपनी सोने की आदत पर भी ध्यान दें: नए साल के आने पर, ये ध्यान भी रखना जरूरी है कि आप रोजाना पूरी नींद लें और इसे एक लक्ष्य के रूप में ही देखें क्योंकि जब इंसान की नींद अधूरी रहती है तो वह पूरी तरह से अपना ध्यान काम में नहीं लगा सकता और स्वास्थय पर भी बुरा असर पड़ता है | कोशिश करें उसी रोजाना एक ही वक़्त पर सोएं और एक ही वक़्त पर उठें ताकि एक आदत बन सके | 

 

संकल्प से सम्बन्धित दिनचर्या का पालन अवश्य करें: अपनी दिनचर्या का एक प्रिंटआउट अपने बेडरूम में जरूर रखें सुबह उठने के बाद उसे देखें और संकल्प की  पुनरावृति करें यदि आपको कवि बनना है तो एक निश्चित समय पर संकल्प के अनुसार कागज और कलम लेकर बैठ जाएं और कोई भी शीर्षक लेकर कविता करें यदि आपको लेखक बनना है तो आप संकल्प के अनुसार निश्चित समय पर कागज कलम लेकर बैठे और विषय से संबंधित लेखन कार्य प्रारंभ करें  संकल्प की समय सारणी का कठोरता पूर्वक पालन करें एक बार लक्ष्य को निर्धारित करने के उपरांत उसे प्राप्त करने के लिए सतत तथा नियमबद्ध तरीके से आगे बढ़ते रहे।


नए साल की शुरुआत करें कुछ नए, आसान और चुनौतीपूर्ण लक्ष्यों से:  बीतें साल में क्या हुआ इस पर गौर करें | सोचें कि आज आप कहाँ है, आपने क्या पाया और किस लक्ष्य को पाने में सफल नहीं हो पाएं | इसी बात का ध्यान रख अपने नए साल के लक्ष्यों को चुनें |

एक योजना बनाएं | एक समय सीमा के हिसाब से काम करें और देखें कि इस नए साल में आप क्या पाना चाहते हैं | ऐसे लक्ष्य सोचें जो मुमकिन हो और बिल्कुल साफ़ और सच्चे दिल से उन्हें पाने के लिए तैयारी करें |

सहयोग या सहायता लेने में कोई बुराई नहीं | एक बार अपने लक्ष्य सोचने के बाद अगर आपको उन्हें पाने में किसी की सहायता चाहिए तो झिझकने से बात नहीं बनेगी | किसी से सहायता मांगने से डरे नहीं | क्या पता किसी की थोड़ी सी सहायता आपको किसी बड़े लक्ष्य को पाने में मदद कर दे | जब आप अपनी ज़िन्दगी में बदलाव लाते हैं तो सहायता और जवाबदेही बहुत काम आती हैं |

सलाह

      अपने किसी मित्र  के साथ मिलकर इनमे से कोई लक्ष्य पूरा करें क्योंकि किसी के साथ से उबाऊ से उबाऊ काम भी मजेदार बन जाता है |


प्रमोद कुमार सिंह(प्रवक्ता)

श्री शिवदान सिंह इण्टर कॉलेज

इगलास, अलीगढ़



22 दिनों में आदत का निर्माण कैसे करे?

द स्टार्टअप

21 डे हैबिट टाइमलाइन: 21 दिन (दिन के हिसाब से दिन में एक आदत कैसे बनती है!)

एलियास स्कली

क्या 21 दिन की आदत जैसी कोई चीज होती है ? क्या नई आदत बनाने में वास्तव में केवल 21 दिन लगते हैं ?

हम सब जल्दी और अच्छी तरह से अच्छी आदतों को बनाना चाहते हैं। आदतें व्यावहारिक रूप से फायदेमंद हैं: वे काफी स्वचालित हैं; प्रदर्शन करने के लिए कोई प्रयास न करें और मूल रूप से हमें कम के साथ अधिक करने की अनुमति दें।

तो यह पूछना कि क्या 21 दिन की आदत एक मिथक है, यह पूछना एक महत्वपूर्ण सवाल है, तो क्या यह वास्तव में एक मिथक है?

1. क्या आप 21 दिनों में एक नई आदत बना सकते हैं?

अपने अनुभव के आधार पर, मैं हां कहने के लिए इच्छुक हूं। नई आदत बनाने में लगभग 21 दिन लगते हैं।

हालांकि, एक हालिया अध्ययन ने 21 दिन की आदत गठन सूत्र को एक मिथक के रूप में वर्णित किया है।फिलिप्पा लल्ली के अनुसार; यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में एक स्वास्थ्य मनोविज्ञान के शोधकर्ता, एक नई आदत आमतौर पर 2 महीने से अधिक लेती है - 66 दिन सटीक होना - और 254 दिन तक जब तक यह पूरी तरह से नहीं बन जाता।

अध्ययन 96 प्रतिभागियों के व्यवहार पर आधारित था जिन्हें एक आदत चुनने और 12 सप्ताह तक अभ्यास करने के लिए कहा गया था। प्रतिभागियों ने शोधकर्ता को बताया कि समय के साथ उनका नया व्यवहार कितना सहज हो गया। निस्संदेह, परिणाम एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के लिए अग्रणी शोधकर्ता के लिए काफी भिन्नता है कि यह दावा करने के लिए कि स्वचालितता (यानी समय के साथ नया व्यवहार कैसे महसूस किया गया) 21 दिनों की तुलना में तीन से बारह गुना अधिक समय लेता है।

इस समाचार ने व्यक्तिगत विकास समुदाय में सदमे की लहरें भेजीं और प्रत्येक व्यक्तिगत विकास ब्लॉगर को 21 दिन के फार्मूले के बारे में अपने सभी दावों को वापस लेने और इस शोध के निष्कर्षों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया।

लेकिन मुझे अपनी शंका है।

2. 21 दिनों में एक नई आदत बनाना विल-पावर लेता है

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एक नई आदत हासिल करना, सुनिश्चित करना, पार्क में टहलना नहीं है। ज्यादातर लोग नई आदतें बनाने और रखने के साथ संघर्ष करते हैं। वे समय के साथ प्रेरणा खो देते हैं और इस प्रक्रिया में खुद को बंद पाते हैं।

मुझे तुमसे पूछना है:

  • प्रारंभिक रिसर बनने और विफल होने की कितनी बार आपने कोशिश की है?

तो ऐसा लगता है कि यह मानने में कुछ समझदारी है कि आदत बनाने की यात्रा लंबी और कठिन है और यह 21 दिनों से अधिक समय ले सकती है।

लेकिन मुझे यह भी लगता है कि हमें उन लोगों की दृष्टि नहीं खोनी चाहिए जो अपेक्षाकृत कम समय में असाधारण बाधाओं को दूर करने में कामयाब रहे। कभी-कभी यह एक व्यक्ति को धूम्रपान या पीने को रोकने और संयम हासिल करने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण ले सकता है। यह एक व्यक्ति को हर दिन लिखने का फैसला करने के लिए एक उदाहरण ले सकता है और अंत में उसका उपन्यास लिखना समाप्त कर सकता है। स्वस्थ भोजन खाने और वजन कम करने का निर्णय लेने के लिए यह एक व्यक्ति को एक सेकंड का एक फ्लैश भी ले सकता है।

  • क्यों हम से जानने की कोशिश कर नहीं कर रहे हैं इन जो लोग प्रयोग में भाग लिया के बजाय लोगों को?

3. 21 दिवसीय आदत निर्माण गाइड

मेरा मानना ​​है कि आदत निर्माण तीन प्रमुख मानदंडों का एक कार्य है:

(१) प्रतिबद्धता का स्तर

(2) आंतरिक और बाहरी जवाबदेही

(३) आदत का आकार

3.1 21 दिनों के लिए प्रतिबद्ध एक नई आदत बनाने के लिए

यदि आप काम करने के लिए 21 दिन की आदत बनाने के लिए गाइड चाहते हैं, तो आपको यह पहचानना होगा कि नई आदत बनाना कोई आसान उपक्रम नहीं है। यह अपने आप नहीं बनेगा। और उस कारण से, आपको यह तय करना होगा कि वह आदत आपके लिए क्यों और कितनी महत्वपूर्ण है।

अपने आप से यह पूछें:

  • आपके दिन पर क्या फर्क पड़ने वाला है?

एक बार जब आप इन प्रश्नों का उत्तर दे देते हैं , तो आपको अपने उत्तर भावनात्मक रूप से आकर्षक भाषा में तैयार करने होंगे। भावनात्मक रूप से आवेशित रूप से उन्हें चित्रित करके, आप एक नया "कथा" बना रहे हैं कि आप कौन हैं। आप अपनी नई आदत में जान डाल रहे हैं।

बिस्तर पर जाने से पहले अपने आप को यह कहानी बताएं। ये मानसिक छवि मनोवैज्ञानिक गोंद बन जाती है , यदि आप ऐसा करेंगे, जो आपको और आपकी नई आदत को एक साथ रखती है। उस कहानी के बिना, आदत नहीं रहेगी।

अपने आप को पाठ्यक्रम से बाहर रखने के लिए, आपको ध्वनियों को जोड़ने से लाभ होगा, और यहां तक ​​कि गंध की संवेदनाएं और अपनी कहानी को छूने के रूप में आप इसे अपने आप को सुनाते हैं। आपको अपने आप को पहले से ही अपनी आदत का अभ्यास करने और इसके परिणामों के साथ रहने के रूप में देखना होगा। आप जल्दी उठने वाले व्यक्ति नहीं हैं, आप एक शुरुआती रिसर हैं। तुम एक धावक हो। आप एक लेखक हैं। आप धनवान हैं। होशपूर्वक अपने आप को इस तरह से पहचान कर, आप अपने आप को उन कौशल पर काम करने की मांग कर रहे हैं जो आपको वहां पहुंचने में मदद करेंगे। अपने कारणों को मजबूत और अधिक लुभावना अपनी नई आदत के लिए हैं, जितना जल्दी आप इसे प्राप्त करेंगे और यह उतना ही मजबूत होगा।

दूसरी ओर, धुंधली और अकल्पनीय कहानियों को आसानी से भुला दिया जाता है। वास्तव में, जो लोग खुद को मनोरम कहानियां नहीं बताते हैं, वे अपनी प्रेरणा को इतना खो देते हैं कि वे भूल जाते हैं कि उन्होंने पहली बार अपनी नई आदत को लेने का फैसला क्यों किया। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो कहानी उन्होंने खुद बताई थी वह नई आदत के लिए पर्याप्त नहीं थी।

3.2 21 दिनों में एक आदत से जवाबदेही योजना

यदि आप अपनी अंतरात्मा के माध्यम से आंतरिक रूप से जवाबदेह हो सकते हैं; और बाहरी रूप से एक जवाबदेही प्रणाली के माध्यम से जैसे कोच या सोशल सपोर्ट ग्रुप, तो आप उन सिस्टम की तुलना में अधिक तेज़ी से एक आदत बना सकते हैं यदि आपके पास वे सिस्टम नहीं थे, और ये सिस्टम जितने बेहतर हैं, उतने ही बेहतर परिणाम आपको मिलने वाले हैं।

जब अपने आप को जवाबदेह रखने की बात आती है, तो यह जरूरी है कि आप अपने सबसे अच्छे दोस्त बनें। आप अपने आप को ट्रैक पर बने रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं और अपने आप को यह याद दिलाना चाहते हैं कि आपने कितनी दूर की यात्रा की है। आप अपने आप को प्यार की गहरी भावना से जवाबदेह ठहराते हैं और खुद को सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए देख सकते हैं। यह अपने आप को पुलिसिंग के पारंपरिक दृष्टिकोणों से बहुत अलग है ... वे दृष्टिकोण (यदि बुद्धिमानी से उपयोग नहीं किए गए हैं) काउंटर-उत्पादक हैं और आप इस आदत को नापसंद कर सकते हैं और यहां तक ​​कि पूरी तरह से अभ्यास करना बंद कर सकते हैं।

कभी-कभी यह सब अपने दम पर करने की कोशिश करना एक वास्तविक संघर्ष हो सकता है। हमेशा हर हीरो के पीछे एक सपोर्ट ग्रुप होता है। परिवार के सदस्यों या दोस्तों को आपके ट्रैक पर रहने में मदद करने के लिए सूचीबद्ध करना आपकी यात्रा में नाटकीय अंतर ला सकता है।

हालांकि, अधिकांश लोग पेशेवर के साथ काम करना पसंद करते हैं। इस संबंध में, एक कोच एक उपयुक्त विकल्प है। एक कोच आपको सटीक सिफारिशें दे सकता है जो विशेष रूप से आपकी आवश्यकताओं के अनुरूप हैं। एक निष्पक्ष पर्यवेक्षक के रूप में, एक कोच ईमानदारी से आपको बताएगा कि आप कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं और आपको क्या करना है। इसलिए यदि आप बाधाओं को दूर करने के लिए नए तरीकों और शॉर्टकटों की तलाश कर रहे हैं, तो अतीत की विफलता को आगे बढ़ाएं, और अपने लक्ष्यों को महसूस करें, फिर सही कोच के साथ काम करने से आपकी खोज में एक विशिष्ट अंतर आ सकता है।

3.3 आप जिस फॉर्म को चाहते हैं, उसका आकार निर्धारित करें

यदि आपकी लक्ष्य आदत बहुत बड़ी है; मैराथन दौड़ना पसंद है, तो आप 21 दिनों में उस आदत को हासिल नहीं करेंगे। इसी तरह, यदि आपका लक्ष्य उचित प्रशिक्षण के बिना रोजाना 2000 शब्द लिखना है, तो इसे एक स्वचालित चीज़ में बदलने में आपको लंबा समय लग सकता है।

अपनी आदतों को मिनी-आदतों में तोड़ दें । ये छोटी प्राप्त करने योग्य गतिविधियाँ हैं जो दैनिक आधार पर करना आसान है। उदाहरण के लिए, एक निश्चित शब्द गणना तक पहुंचने की कोशिश करने के बजाय हर दिन खुद को लिखने की आवश्यकता होती है । हर दिन लिखने की मिनी-आदत (भले ही आपने 50-100 शब्द लिखे हों) एक दिन में 2000 शब्दों को लिखने के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ध्यान दें कि एक दिन में 50-100 शब्द लिखने की आदत से आप सहज हैं, अब आप अपने आप से एक दिन में 150-200 शब्द लिखने के लिए प्रतिबद्ध हो सकते हैं और इसी तरह जब तक आप अपने लक्ष्य लक्ष्य तक नहीं पहुँच जाते।

एक उपकरण के लिए जो आपको कम प्रयास के साथ बेहतर लिखने में मदद कर सकता है, 

यही बात दौड़ने के लिए जाती है - आपका लक्ष्य हर दिन दौड़ना चाहता है और बहुत अधिक संघर्ष के बिना ऐसा करने की इच्छा है। एक बार जब आप अपनी आदत के साथ पर्याप्त सहज हो जाते हैं और आप इसे लगातार करने में सक्षम हो जाते हैं, तो आप इसे एक पायदान ऊपर ले जा सकते हैं और उच्च लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं - जैसे हर दिन मैराथन दौड़ना - और फिर धीरे-धीरे इसे अभ्यस्त गतिविधि में बदल दें। ।

4. आदत निर्माण के लिए एक प्रभावी रणनीति

मैंने अपनी आदतों को बनाने और उन्हें स्वचालित करने में मदद करने के लिए जो रणनीति का उपयोग किया है, वह है, जिसे मैं "आदत स्नातक रणनीति" कहता हूं ।

यहां, मैंने अपनी 21 दिन की यात्रा को एक नई आदत के रूप में देखने का संकल्प लिया, जो क्रमिक कार्य के रूप में हो। मेरा लक्ष्य हर एक दिन छोटी लेकिन लगातार कार्रवाई करना था और धीरे-धीरे मेरी आदत बन गई।

मेरे लिए महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैं एक ऐसा कार्य चुनूं जिसे मैं बहुत अधिक प्रतिरोध के बिना हर एक दिन कर सकूं। मैंने कुछ छोटे से शुरुआत की। और एक बार जब मुझे इसमें महारत हासिल हो जाती है, तो मैंने चुनौती को पार कर लिया और कुछ और थोड़ा चुनौतीपूर्ण करने का संकल्प लिया। मैंने तब हर एक दिन ऐसा करने का संकल्प लिया।

इसलिए, 21 दिनों तक हर दिन 30 मिनट के लिए ट्रेडमिल पर दौड़ने का वादा करने के बजाय, पहले दिन 10 मिनट के लिए दौड़ना शुरू करें (और अगर आपको लगता है कि आप अधिक दौड़ना चाहते हैं तो खुद को संयमित करें), और अगले दिन आप 11 मिनट और 12 मिनट के बाद के दिन आदि के लिए दौड़ते हैं, 21 दिनों के भीतर आप 30 मिनट से थोड़ा अधिक समय तक दौड़ते रहेंगे। 2 महीने में, आप इस 1 मिनट की वृद्धि के परिणाम के रूप में एक घंटे के लिए चल रहे होंगे।

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सावधान रहें कि आप अपने आप को बहुत जल्दी चुनौती न दें। जब आप अपनी नई आदत में बढ़ जाते हैं, तो अपनी प्रगति को प्रतिबिंबित करें और चुनौती को थोड़ा बढ़ा दें।

याद रखें, हर बार जब आप चुनौती को बहुत अधिक या बहुत तेजी से बढ़ाते हैं, तो आप प्रगति नहीं करेंगे और आप प्रेरणा खो देंगे। इसलिए ऐसी चुनौती चुनें जो आपकी सीमा के भीतर हो। यदि आपके पास विशेष रूप से कठिन समय है (उदाहरण के लिए आपके रन के लिए प्रतिबद्ध है), तो आप अपना समय केवल 30 सेकंड बढ़ा सकते हैं। सेकंड और मिनट जल्दी से जोड़ देंगे और आप खुद को आश्चर्यचकित करेंगे कि यह कितना आसान और मजेदार है। याद रखें, आपको प्रगति करते रहना होगा ... मैराथन के दिन आप खुद से मैराथन दौड़ने की उम्मीद नहीं कर सकते।

5. अपने 21 दिन की आदत योजना पर क्या उम्मीद करें

यहाँ मैं अपनी 21 दिन की आदत बनाने की योजना पर अनुभव किया है। आप उन्हीं चीजों का अनुभव कर सकते हैं।

ये रहा:

5.1 दिन 1-3

यह वह जगह है जहाँ आपकी प्रेरणा सर्वकालिक उच्च पर है। उन दिनों के दौरान, आप अपनी आदत का अभ्यास करने के लिए ऊपर और परे जाते हैं। आपकी आदत इस स्तर पर दुनिया में आपकी पसंदीदा चीज है। यहीं से चुनौती मिलने लगती है।

5.2 दिन 4–10

ज्यादातर लोग 4-10 दिनों के बीच छोड़ देते हैं। क्या करें? चित्र, उद्धरण, वीडियो देखें और भावनात्मक रूप से मनोरम भाषा में अपनी नई "कहानी" बताएं। 4 से 10 दिनों का आपका कार्य कल्पना की शक्ति के साथ अपने लक्ष्यों को मजबूत करना है। एक बार जब आप 10 दिन के निशान से गुजरते हैं, तो आपकी आदत प्रदर्शन करने की चुनौती से कम हो जाएगी।

5.3 दिन 11-14

अभी तक गैस पेडल से अपने पैर को कम मत करो। इन दिनों आपका काम यह नोट करना है कि इससे आपके शरीर और आपके दिन पर क्या फर्क पड़ा है। इसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात करें, या एक ब्लॉग शुरू करेंआप कर रहे हैं जिस तरह से 2/3 यह एक मिनी-उत्सव है।

5.4 दिन 15–20

अपने कैलेंडर को चिह्नित करना शुरू करें कि आपने अपना कोर्स पूरा करने के लिए कितने दिन छोड़ दिए हैं। हर दिन जब आप चिह्नित करेंगे, तो आप वास्तव में अच्छा महसूस करेंगे कि आप कितनी दूर निकल आए हैं। यह पाठ्यक्रम का अंतिम 1/3 है।

5.5 दिन 21 और उसके बाद

इस समय तक, आपकी आदत आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जानी चाहिए। यहां से आपका ध्यान इस आदत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए रखने के दीर्घकालिक लाभों पर होना चाहिए और अगर आप इस आदत को जारी रखते हैं तो आप और क्या प्रगति कर सकते हैं।

अइसन गाँव बना दे...

अइसन गाँव बना दे...



स्वाधीनता सेनानी और हिंदी-भोजपुरी के प्रसि़द्ध जनकवि रमाकांत द्विवेदी रमता जी के गीत आ गजल

अइसन गाँव बना दे

अइसन गाँव बना दे, जहां अत्याचार ना रहे।
जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे।

सबके मिले भर पेट दाना, सब के रहे के ठेकाना
कोई बस्तर बिना लंगटे- उघार ना रहे।

सभे करे मिल-जुल काम, पावे पूरा श्रम के दाम
कोई केहू के कमाई लूटनिहार ना रहे।

सभे करे सब के मान, गावे एकता के गान
कोई केहू के कुबोली बोलनिहार ना रहे।

- 18.3.83

हमनी साथी हईं

हमनी देशवा के नया रचवइया हईंजा।
हमनी साथी हईं, आपस में भइया र्हइंजा।

हमनी हईंजा जवान, राहे चलीं सीना तान
हमनी जुलुमिन से पंजा लड़वइया हईंजा।

सगरे हमनी के दल,  गांव-नगर हलचल
हमनी चुन-चुन कुचाल मेटवइया हईंजा।

झंडा हमनी के लाल, तीनों काल में कमाल
सारे झंडा ऊपर झंडा उड़वइया हईंजा।

बहे कइसनो बेयार, नइया होइये जाई पार
हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईंजा।

- 1.5.85

हामार सुनीं

काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी।
हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी।

जब हम करींले पुकार, राउर खुले ना केवांर
एकर कारन का बा, आईं समुझाईं जी।

जइसन फेर में बानी हम, ओहले रउरो नइखीं कम
कवनो निकले के जुगुति बताईं जी।

सोचीं, कइसन बा ई राज, कुछ त रउरो बा अंदाज
देहबि कहिया ले एह राज के दोहाई जी।

जवन सांसत अबहीं होता, का-का भोगिहें नाती-पोता
एह पर रउरो तनि गौर फरमाईं जी।

अब मत फरके-फरके रहीं, सब कुछ संगे-संगे सहीं
संगे-संगे करीं बचे के उपाई जी।

सभे आइल, रउरो आईं, संगे रोईं-संगे गाईं
हम त रउरे हईं, रउरा हमार भाई जी।

त हम का करीं

क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब
केहू का ना सोहाला त हम का करीं।
लाल झंडा हवा में उड़इबे करब
केहू जरिके बुताला त हम का करीं।

केहू दिन-रात खटलो प’ भूखे मरे
केहू बइठल मलाई से नास्ता करे।
केहू टुटही मड़इया में दिन काटता
केहू कोठा-अटारी में जलसा करे।

ई ना बरम्हा के टांकी ह तकदीर में
ई त बैमान-धूर्तन के करसाज ह।
हम ढकोसला के परदा उठइबे करब
केहू फजिहत हो जाला त हम का करीं।

ह ई मालिक ना, जालिम जमींदार ह
खून सोखा ह, लंपट ह, हत्यार ह।
ह ई समराजी पूंजी के देसी दलाल
टाटा-बिड़ला ह, बड़का पूंजीदार ह।

ह ई इन्हने के कुकुर वफादार ह
देश बेचू ह, सांसद ह, सरकार ह।
सबके अंगुरी देखा के चिन्हइबे करब
केहू सकदम हो जाला त हम का करीं।

सौ में पंचानबे लोग दुख भोगता
सौ में पांचे सब जिनिगी के सुख भोगता।
ओही पांचे के हक में पुलिस-फौज बा
दिल्ली-पटना से हाकिम-हुकुम होखता।

ओही पांचे के चलती बा एह राज में
ऊहे सबके तरक्की के राह रोकता।
ऊहे दुस्मन ह, डंका बजइबे करब
केहू का धड़का समाला त हम का करीं।


बेयालिस के साथी

साथी, ऊ दिन परल इयाद, नयन भरि आइल ए साथी

गरजे-तड़के-चमके-बरसे, घटा भयावन कारी
आपन हाथ आपु ना सूझे, अइसन रात अन्हारी
चारों ओर भइल पंजंजल, ऊ भादो-भदवारी
डेग-डेग गोड़ बिछिलाइल, फनलीं कठिन कियारी
केहि आशा वन-वन फिरलीं छिछिआइल ए साथी

हाथे कड़ी, पांव में बेड़ी, डांड़े रसी बन्हाइल
बिना कसूर मूंज के अइसन, लाठिन देह थुराइल
सूपो चालन कुरुक करा के जुरुमाना वसुलाइल
बड़ा धरछने आइल, बाकी ऊ सुराज ना आइल
जवना खातिर तेरहो करम पुराइल ए साथी

भूखे-पेट बिसूरे लइका, समुझे ना समुझावे
गांथि लुगरिया रनिया, झुखे, लाजो देखि लजावे
बिनु किवांड़ घर कूकुर पइसे, ले छुंछहंड़ ढिमिलावे
रात-रात भर सोच-फिकिर में आंखों नींन न आवे
ई दुख सहल न जाइ कि मन उबिआइल ए साथी

क्रूर-संघाती राज हड़पले, भरि मुंह ना बतिआवसु
हमरे बल से कुरसी तूरसु, हमके आंखि देखावसु
दिन-दिन एने बढ़े मुसीबत, ओने मउज उड़ावसु
पाथर बोझल नाव भवंर में, दइबे पार लगावसु
सजगे! इन्हिको अंत काल नगिचाइल ए साथी

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अंदर का शोर अच्छा है थोड़ा दबा रहे
बेहतर यही है आदमी कुछ बोलता रहे

मिलता रहे हंसी ख़ुशी औरों से किस तरह
वो आदमी जो खुद से भी रूठा हुआ रहे

बिछुडो किसी से उम्र भर ऐसे कि उम्र भर
तुम उसको ढूंढो और वो तुम्हें ढूंढता रहे


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Ok सर झुका आंसुओ को पीना आ गया होता
मुझे भी फक्र से जीना आ गया होता।

अगर वक़्ते तूफान थोड़ा ठहर जाता तो
किनारे पर हमारा भी सफीना आ गया होता।

निडर होकर जो अपनी राह चलता चला जाता
मुसीबत को भी पसीना आ गया होता।

अगर हम छोड़ देते ख्वाहिशो की बन्दगी तो
उसूलों /वादों को निभाने का तरीका आ गया होता।


जख्मो को भूल कर दर्द को मरहम बना लेेतेे
जालिम को यदि हाकिम हम बना लेते

क्या जरूरत थी हर पत्थर को परखने की
वक्त पर कोई नगीना मिल गया होता।

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स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों के कुछ और भाषण (हिन्दी और भोजपुरी में)

स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों के कुछ और भाषण (हिन्दी और भोजपुरी में)

दो साल से ज़्यादा बीत गए यहाँ कुछ लिखे। ऐसा नहीं है कि लिखा नहीं जा रहा था, फेसबुक पर तो लगातार कुछ न कुछ लिखते रहे, यहाँ नहीं लगा सके। ब्लॉग जगत से दूरी बनी रही। 15 अगस्त, 2012 के भाषण यहाँ सबसे ज़्यादा पढ़े गए हैं। आज फिर हम कुछ भाषणों को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो 2013, 2014 और हाल में इसी आगामी स्वतंत्रता दिवस के लिए लिखे गए हैं। इस बार दो भोजपुरी भाषण भी दिए जा रहे हैं। 

1

प्यारे साथियो! 15 अगस्त 1947 के बाद 66 साल गुजर गए हैं। हर साल इस दिन हम झंडा फहराते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं, भाषण देते हैं, नाचते गाते हैं, यही हमारी परंपरा हो गई है। लेकिन आजादी जन्मदिन की पार्टी नहीं होती। यह दिन हमें बताता है कि हम आजाद हैं। यह बात एक मायने में जरूर सही हो सकती है लेकिन क्या सचमुच हम आजाद हैं? आदमी का इतिहास बताता है कि ग़रीब और कमज़ोर हमेशा रईसों और ताककवरों के गुलाम रहे हैं। यह बात भारत के लिए भी सच है। आजादी की कीमत उस लड़के से पूछकर देखिए, जो 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्कूल के किसी कार्यक्रम या आयोजन में जाकर खुश होने की जगह सड़कों पर 1-2 रुपए में झंडे बेचता है। 

एक ठुमके के 1 करोड़ कमाने वाले फिल्मी सितारे, एक बल्ले को हवा में हाँकने पर लाखों रुपए लेने वाले खिलाड़ी और करोड़ों रुपए अपनी पोती के नाम पर एक दिन में पानी में बहा देने वाले सहारा और 5 लोगों के रहने के लिए गरीबों के खून से करोड़ों की बिल्डिंग बनवा लेने वाले मुकेश अम्बानी, इन सबके लिए तो आजादी पैरों की जूती है। और यही लोग अब हमारे देश में बच्चों और युवाओं के आदर्श बन रहे हैं। भगतसिंह जैसे शहीदों की चमक फीकी पड़ती मालूम रही है। जरूरत है भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों को आदर्श के रूप में अपनाने की। 

भगतसिंह जैसे व्यक्ति को आदर्श बनाना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि उनकी कहानी सुनाने भर से शासक डर जाते हैं। हाल में महाराष्ट्र में एक लड़की द्वारा भगतसिंह की गाथा गाने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। जिस व्यक्ति की कहानी से ही सरकारें डर जाती हों, लुटेरे दमन शुरू कर देते हों, वह व्यक्ति जब इस देश और दुनिया के लाखों करोड़ों युवाओं और बच्चों का आदर्श बन जाएगा तब जाकर यह दुनिया बेहतर जगह बन पाएगी। 

यह ध्यान रहे कि सैम की जगह श्याम के शासक बन जाने भर से देश आजाद नहीं हो जाता, यह तो सिर्फ कुर्सी की अदला बदली है। यही तो 15 अगस्त 1947 को भी हुआ।

जिन्होंने लूटा मुल्क को सरेआम
उन लफंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता
गरीब लहरों पर पहरे बिठाए जाते हैं
समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता

मेरी बातों को नकारात्मक न मानकर सोचने लायक माना जाए, यह मेरा अनुरोध है। हमें दुनिया से हर किस्म के शोषकों का खात्मा करना होगा। वरना यह आजादी झूठी ही रहेगी। हालात तो यह है कि 

डाढ़ी जड़ अब गाछ के बाटे रहल बटोर।
आखिर फल कइसे मिली, पत्ता पत्ता चोर।।

मैं इतना कहकर अपनी बात समाप्त करता हूँ कि ध्यान रहे आजादी अभी अधूरी है। 

(2013)

2


उपस्थित सज्जनो और मेरे साथियो! आज हमारा देश आज़ादी की 67वीं वर्षगाँठ मना रहा है। सबसे पहले मैं अपने विद्यालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आपका स्वागत करता हूँ। 

आज़ादी का जश्न मनाना कितना आसान है! लेकिन इस आज़ादी को पाना कितना मुश्किल! आज़ादी पाने की क़ीमत क्या है, यह तब पता चलता है जब हम आज़ादी के दीवानों की कहानियाँ पढ़ते हैं। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, शिव वर्मा जैसे क्रांतिकारियों की दास्तान दिल दहलाने वाली है। भूख हड़ताल में जतिनदास के प्राण चले गए, हैवानों और साम्राज्यवादियों के खिलाफ़ लड़ने वाले भगवतीचरण वोहरा बम का परीक्षण करते समय चल बसे, भगतसिंह मात्र साढ़े तेईस साल की उम्र में फाँसी चढ़ गए, खुदीराम बोस मात्र 19 साल की उम्र में फाँसी पर लटका दिए गए, कई क्रांतिकारियों को काले पानी की सज़ा दी गई, तो कई मानवता के दुश्मनों की गोली का शिकार हो गए। क्रांतिकारी हमसे विदा लेते वक़्त कहते थे - 

गोली लगती रही खून गिरते रहे
फिर भी दुश्मन को हमने न रहने दिया
गिर पड़े आँख मूँदे धरती पे हम
पर ग़ुलामी की पीड़ा न सहने दिया
अपने मरने का हमको न ग़म साथियो
कर सफ़र जा रहे दूर हम साथियो!

हमारे क्रांतिकारी अंग्रेजों की हैवानियत का शिकार होते रहे और एक दिन हमें आधी अधूरी आज़ादी मिल गई। वह दिन था 15 अगस्त 1947, जिस दिन को भारत का स्वतंत्रता दिवस कहते हैं। लेकिन भगतसिंह ने कहा था कि उनकी लड़ाई अंग्रेजों तक खत्म नहीं होगी। यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का, एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण करता रहेगा।

हमें भगतसिंह के कथन पर सोचना ही होगा और उनके सपनों को हकीकत में बदलना होगा। साधारण जनता के शोषकों की गहरी नींद को तोड़ना ही होगा। भगतसिंह ने 8 अप्रैल 1929 को एसेंबली में बम फेंकते हुए कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है। ऐसे हज़ारों लाखों भगतसिंह की ज़रूरत इस दुनिया को है।

चलते चलते भगतसिंह का वह नारा जो उन्होंने एसेम्बली में लगाया था -

इंकलाब ज़िंदाबाद!

(15 अगस्त 2013 के लिए लिखा...)

3

उपस्थित सज्जनो और साथियो! आज हमारा देश आज़ादी का जश्न मना रहा है। 1947 के बाद 68 साल पूरे हो गए हैं। अंग्रेजों की लम्बी ग़ुलामी से हमारा देश यूँ ही आजाद नहीं हुआ। इसमें लाखों हिन्दुस्तानियों ने अपना सब कुछ गँवा दिया। आज इस देश में ऐसी ताकतें बढ़ने लगी हैं, जो आपस में मेलजोल की जगह फसाद और नफरत को बढ़ावा देती हैं। आपस में धर्म और संप्रदाय के नाम पर लड़ाने का इनका इरादा हम कामयाब नहीं होने दें, आज यह तय करें।

देश में कुछ संगठन और राजनीतिक दल नफरत फैलाकर आमलोगों की रोज़ की जरूरतों से ध्यान हटाना चाहते हैं। दुर्भाग्य है कि ऐसे ही लोग कई ऊँची जगहों पर पहुँच गए हैं। हमारा मकसद ऐसी ताकतों को कमजोर करना होना चाहिए। आए दिन मानवता की बात करने और मेलजोल को बढ़ाने वाले लोगों को उनलोगों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है, जिनका आज़ादी और आज़ादी की लड़ाई से कोई रिश्ता ही नहीं रहा है। जो अंग्रेज़ी सत्ता से मिले हुए थे, उनके भक्त देश में धर्म के नाम पर झगड़े, दंगे करवाते रहते हैं।

आज इस अवसर पर हम सब यह शपथ लें कि ऐसी फासीवादी ताकतों से देश और दुनिया को बचाए रखेंगे।

जय एकता! जय मानवता!

(6.8.2015)

भोजपुरी भाषण 

1

बिद्यालय में आइल हमार देसवासी भाई बहिन लोग! आजे के दिन हमनी के देस आजाद भइल रहे, एही से हर साल पनरे अगस्त के हमनी सभ ए दिन के अपना आजादी के तेवहार के रूप में मनाइले। हई आकास में लहरात तिरंगा झंडा आजादी के निसान ह।

हमनी आज के दिन ई कसम खाए के कि अपना देस के, आजादी के आ धरती के रक्छा करेम। अतने कह के हम आपन बात खतम करs तानी कि हमनी के तिरंगा झंडा हमेसा अइसहीं लहरात रहे।

2

आजादी के ए महान परब पर रउरा लोगन के हम स्वागत करs तानी। आज हमनी के देस के आजादी के 68 साल पूरा हो रहल बा। अंगरेजन के जुलुम आ अतेयाचार से तबाह होके देस के बहादुर लोग दू स बरिस ले लगातार लड़ाई लड़ल आ अन्त में पनरे अगस्त उनइस सौ सैंतालिस के आजादी के सपना पूरा भइल। बाकिर आजो ए देस के करोरन लोग खातिर आजादी एगो सपने बा। हमनी के ई सपना पूरा करे के पड़ी। अपना महान सहीद लोग के जान लगा के मिलल ए आजादी के सहेज के राखे के पड़ी ना तs फेर आजादी खतरा में पड़ जाई। ए देस के जवान लोग से हमार हान जोड़ के निहोरा बा कि आजादी के मोल समझीं आ ओकरा खातिर आपन जान देवे के पड़े तबो ओकरा के सहेज के राखीं। अतना कह के हम आपन बात खतम कर रहल बानी।

आजादी अमर रहो!
आजादी अमर रहो!

हिंदी कठिनता निवारण-6

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 6

अक्षरों पर चल रही चर्चा अभी ज़ारी है। इस सिलसिले में आज हम ड, ड़, ढ, ढ आदि पर नज़र डालेंगे।

पहले भी यह बात आई थी कि ‘ड़’ और ‘ढ़’ मुख्य वर्णमाला में न आकर बाद में जुड़ते हैं। पहली बात हम कहना चाहते हैं कि बिन्दी वाले ‘ड’ यानी ‘ड़’, बिन्दी वाले ‘ढ’ यानी ‘ढ़’, ‘ङ’, ‘ञ’ और ‘ण’ से कोई शब्द शुरू ही नहीं होता। इसलिए शब्द की शुरूआत में ‘ड़’ या ‘ढ़’ लगाना ठीक नहीं है। बहुत सारे लोग, लेखक, अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी यह ग़लती करते देखे जाते हैं। यह परंपरा ज़्यादा पुरानी नहीं लगती, यह नई परंपरा ही लगती है, जो कुछ दशक पुरानी हो सकती है। अंग्रेज़ी या यूरोपीय भाषाओं और संस्कृत के शब्दों में ड़, ढ़ आते ही नहीं हैं। जैसे बैड़, कामरेड़, एड़ल्ट, एड़जस्ट, कार्ड़ आदि ग़लत हैं, क्योंकि उच्चारण के लिहाज से इनमें ‘ड’ आता है, ‘ड़’ नहीं। आप ‘कार्ड़’ का तो उच्चारण भी ठीक से नहीं कर पाएँगे। शुद्ध रूप बैड, कामरेड, एडल्ट, एडजस्ट, कार्ड हैं। ‘र्’ (आधा ‘र’) के बाद तो ‘ड़’ या ‘ढ़’ आते ही नहीं कभी। आप ‘ड’ बोलते हैं, तो ‘ड़’ लिखना और ‘ड़’ बोलते हैं तो ‘ड’ लिखना, दोनों ही ग़लत है। गुड (अंग्रेज़ी का अच्छा), गुर (तरीका, कौशल) और गुड़ (गन्ने या चुकंदर से बनी चीज़, जो मीठी होती है) का फर्क आप जानते हैं। आप अगर अंग्रेज़ी के सही उच्चारण देखें, तो आप पाएंगे कि वहाँ ‘ड़’ है ही नहीं। ‘ढ़’ की तो बात छोड़ ही दें, क्योंकि वहाँ ‘ढ’ ही नहीं है। ‘ड़’ और ‘ढ़’ के लिए अंग्रेज़ी में क्रमशः ‘d’ और ‘rh’ लिखा जाता है।

सवाल ड़-ड और ढ-ढ़ के सही प्रयोग का है। यह आसान है। बस इन बातों का ध्यान रखें। ‘ड़’ और ‘ढ़’ कभी संयुक्ताक्षर में नहीं आते (या कहें कि ‘ड़’ या ‘ढ़’ न तो किसी आधे अक्षर के बाद आते हैं, न इनका आधे रूप का प्रयोग होता है), जैसे हड्ड़ी या गड्ढ़ा, दोनों ग़लत हैं। इनके शुद्ध रूप हड्डी और गड्ढा हैं। ढ़ेर, ढ़क्कन, ढ़ोल, ढ़कोसला, ढ़ोना, ढ़ाबा, ड़ब्बा, ड़गर, ड़ंका, ड़ायरी आदि सारे शब्द अशुद्ध हैं। इन सबमें पहला अक्षर ‘ढ’ या ‘ड’ होना चाहिए, क्योंकि ‘ड़’ या ‘ढ़’ से हिन्दी पट्टी में कोई शब्द शुरू ही नहीं होता। सही रूप ढेर, ढोल, ढक्कन, ढाबा, ढकोसला, डब्बा, डंका, डायरी आदि हैं।

एक आसान-सा नियम आप यह भी मान सकते हैं कि अनुस्वार के बाद ड़ या ढ़ का प्रयोग नहीं कर सकते, जैसे कांड, दंड, ठंढ आदि को कांड़, दंड़, ठंढ़ नहीं लिख सकते। अनुस्वार के बाद ‘ड़’ या ‘ढ़’ का उच्चारण करना भी असंभव-सा है। हाँ, चंद्रबिन्दु के बाद ‘ड़’ या ‘ढ़’ का प्रयोग कर सकते हैं। संस्कृत पढते-लिखते समय भी हम ‘ड़’ या ‘ढ़’ का प्रयोग नहीं करते। इनके उच्चारण पर हम चर्चा कर चुके हैं। यहाँ ‘ड़’ और ‘ढ़’ कब-कब नहीं लिखते, यह बताया गया है। फिर इनका प्रयोग करेंगे कहाँ! शब्द के बीच में या अंत में इनका प्रयोग कर सकते हैं, वह भी बिना चिंता किए। बीच या अंत के प्रयोग में कुछ शब्दों को अपवादस्वरूप छोड़ दें, तो यह छूट काफी हद तक है कि हम ‘ढ’ या ‘ढ़’ दोनों में से किसी का प्रयोग कर सकते हैं। ‘ड’ या ‘ड़’ के मामले में यह छूट नहीं है। एक वाक्य में कहें तो जहाँ आप उच्चारण ‘ड’ का करते हैं, वहाँ ‘ड’ लिखें, जहाँ ‘ड़’ का करते हैं, वहाँ ‘ड़’ लिखें। ‘ढ’ बोलते हों, तो ‘ढ’ लिखें और ‘ढ़’ बोलते हों तो ‘ढ़’ लिखें। जैसे झंडा, भाड़ा, गाड़ी, गार्ड, कीड़ा, गुड्डी, गड्ढा, आढ़त, गड़बड़ आदि उदाहरण के तौर पर आप देख सकते हैं। कई शब्दों के दो रूप प्रचलित हैं, खासकर उन शब्दों के जिनमें ‘ढ’ और ‘ढ़’ बीच में या अंत में आए। पढना-पढ़ना, गढ-गढ़, चढाई-चढ़ाई, बाढ-बाढ़, गाढी-गाढ़ी आदि ऐसे कुछ उदाहरण हैं। दोनों रूपों वाले शब्द प्रायः क्रियाओं से जुड़े होते हैं। हाँ, उच्चारण की बात करें, तो पढना और पढ़ना में अंतर है। पढना को padhna और पढ़ना को parhna से समझ सकते हैं। ढाँढस, ढिंढोरा, ढिंढोरची, निढाल आदि कुछ शब्द ऐसे हैं, जिनमें ‘ढ’ बीच में आता है। इनमें ‘ढ’ की जगह ‘ढ़’ का प्रयोग ठीक नहीं माना जाएगा।

मर्डर, हार्ड, बोर्ड, डोमेस्टिक, डस्टर, एडमिशन, डर्टी, डांस, डैश, डल, एडवोकेट, वर्ड, संस्कृत में गरुड, फ़्रांसीसी में मैडम आदि कुछ शब्दों में ‘ड’ का प्रयोग हुआ है। खास बात यह है कि उच्चारण तो लोग सही करते हैं, लेकिन लिखते ग़लत हैं। संस्कृत में गरुड और क्रीडा लिखते हैं, जबकि हिन्दी में गरुड़ और क्रीड़ा। घबराना और घबड़ाना दोनों रूप सही माने जाते हैं, यह भी बताते चलें।

अस्मुरारी नंदन मिश्र जी ने बताया कि नियम यह है कि दो स्वरों के बीच में आने पर उच्चारण ‘ड़’ और ‘ढ़’ होता है! संयुक्त होने पर यानी किसी भी एक तरफ स्वर के नहीं होने पर ‘ड’ और ‘ढ’ होता है। बूढ़ा-बुड्ढा, गुड्डी- गुड़िया!

यह बहुत हद तक सही व्याख्या प्रस्तुत करता है, लेकिन यूरोपीय और संस्कृत शब्दों पर लागू नहीं होता। निढाल, निडर, अडिग आदि में भी यह नियम काम नहीं करता। यह कहा जा सकता है कि ध्यान देने पर ही ठीक-ठीक प्रयोग करने की आदत डाली जा सकती है। ‘ढ़’ का प्रयोग वहीं करें जहाँ र्ह (र् +ह) का उच्चारण होता हो।

’ड़’ वाली कुछ क्रियाएँ अकड़ना, लड़ना, सड़ना, झगड़ना, पड़ना, ताड़ना, फाड़ना, गाड़ना, छोड़ना, जोड़ना, झाड़ना, निथाड़ना, निचोड़ना, तोड़ना, फोड़ना, छिड़ना, छिड़कना, छेड़ना, बड़बड़ाना, खड़ा होना, उखड़ना, तड़पना, फड़फड़ाना आदि हैं। क्रियाओं में ‘ड’ की जगह ‘ड़’ ही मिलता है अक्सर। शायद ही कुछ क्रियाओं में ‘ड’ हो। ‘ढ़’ वाली कुछ क्रियाएँ काढ़ना, गढ़ना, चढ़ना, चिढ़ना, पढ़ना, बढ़ना, मढ़ना आदि हैं।

जब एक साथ ‘र’ और ‘ड़’ आते हैं, तो पहले ‘र’, फिर ‘ड़’ होता है; ऐसा अधिकांश स्थितियों में होता है। करोड़, रोड़ा, अरोड़ा, रोड़ी, मरोड़, गरुड़ आदि उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं। 

हिंदी कठिनता निवारण-5

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 5

हम आज स्वर वर्णों और मात्रायुक्त व्यंजनों के उच्चारण पर चर्चा करेंगे। आगे वचन, लिंग, विशेषण आदि पर यानी शब्दों पर विस्तार से बात करेंगे।

अ का दीर्घ रूप आ, इ का दीर्घ रूप ई, उ का दीर्घ रूप ऊ, ए का ऐ और ओ का औ है। दीर्घ रूपों का उच्चारण ज़्यादा समय लेकर किया जाता है। कई बार राजनीति को राजनीत कहते इसी कारण सुना जाता है। तुलसी, रहीम, कबीर आदि के दोहों में आप बात, प्रात जैसे अकारांत (अकार के साथ समाप्त होने वाले) शब्दों के तुक जाति, भाँति जैसे इकारांत (इकार के साथ समाप्त होने वाले) शब्दों से मिलते देख सकते हैं। यही बात उकारांत (जैसे राहु, केतु, हेतु, सेतु आदि) शब्दों के साथ भी आप देख सकते हैं। यानी प्रेत का तुक सेतु से मिल सकता है। इसका कारण है— ह्रस्व मात्रा वाले वर्ण और अकार के उच्चारण में समानता का माना जाना। दीर्घ स्वर वाले वर्ण को बोलने में अधिक समय लिया जाता है। कलि और कली, हरि और हरी, रुपया और रूप आदि पर ध्यान दीजिए। कलि में ‘लि’ तुरंत बोला जाता है, जबकि कली में ‘ली’ लम्बे समय तक ईकार के उच्चारण के साथ बोलेंगे। अगर यह फर्क नहीं समझेंगे तो भीख और भिखारी; पूजा और पुजारी; भूलना और भुलाना; लूटना और लुटना; फुल (full), फ़ूल (fool) और फूल (पुष्प) आदि का उच्चारण दोषपूर्ण हो जाएगा। यही नहीं, इस गड़बड़ी से गीतों को ठीक-ठीक धुन और संगीत के साथ भी नहीं गा पाएंगे। सोचिए अगर ‘ऐ मेरे वतन के लोगो! तुम खूब लगा लो नारा’ की जगह ‘ए मैरे वतन के लौगौ तूम खुब लग्गा लो नारा’ गाएँ, तो कैसा लगेगा! संगीत की शिक्षा के लिए भी उच्चारण ज्ञान ज़रूरी है। कूल (अंग्रेज़ी का ‘ठंढा’ या हिन्दी का ‘किनारा’) और कुल (टोटल, सब, समूचा, सारा) दोनों में ऊकार और उकार का उच्चारण सही-सही करना होगा। कूल में ‘कू’ बोलते समय मुँह खुलने के बाद कुछ देर खुला ही रहेगा और ज़्यादा खुल सकता है, जबकि कुल में ‘कु’ बोलते समय तुरंत मुँह से ‘कु’ निकलेगा और अगला अक्षर उच्चारित होगा। ईकार, ऊकार, ऐकार, औकार और अनुस्वार के उच्चारण में मुँह ज़्यादा खुल सकता है; जबकि इकार, उकार, एकार और ओकार के उच्चारण में सामान्यतः मुँह कम खुलता है। मुन्ना को मून्ना या चिता को चीता बोलना ठीक नहीं होगा। कवीता बोलना ग़लत होगा, कविता सही। इसी प्रकार एकार का उच्चारण ऐकार करना ठीक नहीं होगा। बेल को बैल या थैला को थेला कहना, गोल को गौल या मौर्य को मोर्य कहना; ग़लत होगा। 

‘ऑ’ का उच्चारण करना भी ध्यान देने पर ठीक से किया जा सकता है। आ और ओ-औ के बीच का उच्चारण ऑ को माना जा सकता है। ‘कॉल’ को काल या कौल न कहकर, कॉल कहना चाहिए। ‘आ’ के उच्चारण में मुँह दोनों गालों की ओर फैलता है या अगल बगल फैलता है, ‘औ’ में मुँह ऊपर नीचे (यानी नाक और ठुड्ढी की ओर) और अगल-बगल दोनों तरफ़ फैलता है, जबकि ‘ऑ’ के उच्चारण में ‘औ’ की तरह ‘अव्’ नहीं निकलेगा। ‘ऑ’ में जीभ ऊपर की ओर तो जाती है, लेकिन मुँह ऊपर-नीचे नहीं खुलता। ‘कालेज’ या ‘कौलेज’ कहने की जगह ‘कॉलेज’ कहने की आदत डालनी चाहिए। इस ‘ऑ’ को अर्धचंद्र कहते हैं। हाट, होट, हौट और हॉट बोलकर आप अभ्यास कर सकते हैं और उच्चारण की भिन्नता महसूस कर सकते हैं। यह अंग्रेज़ी से आए शब्दों में ही होता है; संस्कृत, अरबी आदि के शब्दों में नहीं। हॉल, कॉल, जॉन, ऑक्सीजन, डॉक्टर, बॉल, फुटबॉल आदि इसके कुछ उदाहरण हैं। इसकी जगह चंद्रबिन्दु का प्रयोग भी लोग कर देते हैं, लेकिन यह ठीक नहीं है। डॉक्टर की जगह डाँक्टर कहना या लिखना सही नहीं है।

चंद्रबिन्दु के उच्चारण में नाक की मदद ली जाती है। अँ, आँ, उँ, ऊँ आदि का उच्चारण चंद्रबिन्दु वाले शब्दों में करना होता है। कँवल, गाँव, उँगली, ऊँचा, कूँची, भेंट, कैंची, जोंक, भौंक आदि कुछ शब्द इसके उदाहरण हैं। कई पेंटरों को अक्सर गाँधी को ‘गॉधी’ लिखते हुए देखा जा सकता है। यह ग़लत है और इससे बचना चाहिए। गाँव, पाँव, माँ, यहाँ आदि को गॉव, पॉव, मॉ, यहॉ नहीं लिखना चाहिए।

अब हम दोहरे वर्णों पर विचार करते हैं। पका और पक्का दो अलग-अलग शब्द हैं। ‘पका’ परिपक्वता, फल का तैयार होना या समय के साथ गुणों की वृद्धि को बताता है और पकना क्रिया से जुड़ा है, जबकि ‘पक्का’ निश्चय को या किसी वस्तु आदि की पूर्व स्थिति या कच्चेपन के विपरीत या ऊँची या बाद की अवस्था को बताता है। पक्का में क् + क है, जिसके उच्चारण में दो बार ‘क’ बोलना होता है लेकिन ध्यान रहे ‘कक’ नहीं बोलना है। बचे और बच्चे, मज़ा और मज्जा, कटा और कट्टा, पता और पत्ता, हम और हम्म, गदा और गद्दा आदि में भेद करने के लिए दोहरे वर्णों पर ध्यान देना होगा। भोजपुरी भाषी ‘बत्ता देम’ और ‘बता देम’ का फर्क समझ सकते हैं

हिंदी कठिनता निवारण-4

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 4

पिछले भाग में हम उच्चारण पर चर्चा कर रहे थे। पहले हिन्दी के संयुक्ताक्षरों पर विचार करते हैं। फिर उर्दू, जो स्वतंत्र रूप में कोई भाषा ही नहीं है, के अक्षरों पर भी आएंगे। 

क्ष, त्र, ज्ञ, स्र और श्र पर विचार करते हैं।

क्ष = क् + ष, त्र = त् + र, ज्ञ = ज् + ञ, स्र = स् + र, श्र = श् + र

‘क्ष’ का उच्चारण ‘अक्छ’ करना ग़लत है। इसके उच्चारण में पहले ‘क्’, फिर ‘ष’ आता है। जैसे ‘क्षेत्र’ को ‘छेत्र’ न कहकर ‘क्-षेत्र’ कहेंगे। ‘क्ष’ का प्रचलित उच्चारण ‘क्छ’ है। ‘त्र’ में कोई समस्या नहीं है। ‘ज्ञ’ का उच्चारण ‘ग्य’, ‘ग्यँ’, ‘द्न’, ‘द्यँ’, ‘ज्यँ’, ‘ज्न’ आदि बोलकर किया जाता है। महाराष्ट्र में विद्नान या विद्याँन कहा जाता है विज्ञान को। आर्यसमाजी ‘ज्यँ’ कहते हैं, लेकिन सामान्य उच्चारण ‘ग्यँ’ है। इसका शुद्ध उच्चारण समय के साथ छूटता चला गया। सामान्यतया इसका उच्चारण ‘ग्य’ ही हो रहा है। चाहें तो हम इसका उच्चारण ‘ज्यँ’ जैसा कर सकते हैं, जो ‘ज्’ और ‘ञ’ के सम्मिलित रूप के करीब है। ‘मिस्र’ देश का नाम है, जिसमें ‘स’ के साथ ‘र’ है, जबकि ‘मिश्र’ जातिसूचक शब्द है, जहाँ ‘श’ और ‘र’ हैं। अंग्रेज़ी में ‘क्ष’ के लिए ‘ksh’, ‘त्र’ के ‘tr’ लिए और ‘ज्ञ’ के लिए ‘gy’, ‘jn’, ‘jyn’ आदि का प्रयोग हम सब करते हैं। ‘ज्ञ’ के ‘jn’ का प्रयोग ठीक रहेगा। ‘क्ष’ के लिए ‘x’ भी लिखा जाता है।

अब हम ‘ऋ’ और ‘र’ पर आते हैं। ‘ऋ’ को किसी व्यंजन में लगाने पर व्यंजन के नीचे रोमन अक्षर ‘सी’ (c) जैसा संकेत दिखता है। इसका उच्चारण ‘र’ के रूप में मध्यप्रदेश और राजस्थान आदि में हो रहा है। ग्रह और गृह दोनों को ग्रह पढ़ना नागरी और हिन्दी की वैज्ञानिकता के विरुद्ध है। गृह को ग्रिह जैसा पढा जाता है और यह ठीक भी है, क्योंकि ‘ऋ’ का उच्चारण भी खत्म सा हो चला है। संस्कृति और दृष्टि को संस्क्रति और द्रष्टि न पढ या लिख कर संस्कृति और दृष्टि लिखा जाए और संस्क्रिति जैसा पढा जाय। गृह घर है और ग्रह खगोलीय पिंड; इस अंतर को बना और बचा कर रखना ठीक होगा। ऋकार को महाराष्ट्र और उड़ीसा में ‘रु’ भी पढने की परंपरा है; जैसे - कृति को क्रुति। हरियाणा के एक लेखक की किताब में हमने ऋकार का पूरा लोप देखा है। पूरी किताब में कहीं ऋकार नहीं लगा है, जैसे कृति को कति, सृष्टि को सष्टि। इसे भी उचित नहीं मान सकते। अंग्रेज़ी में तो प्रायः ‘संस्कृत’ को ‘Sanskrut’ लिखते देखा जा सकता है। ‘ऋ’ और ‘रि’ में उच्चारण की दृष्टि से कोई भेद नहीं है। हम रि या ri की ही अनुशंसा करेंगे। यह ज़रूरी बात है कि ध्वनियों में अनेक परिवर्तन हो गए हैं, फिर भी लिपि में परंपरा का पालन किया जा रहा है।

स्कूल, स्त्री, स्थान, श्लोक, स्मृति, स्थापना, स्कंद, स्पष्ट, स्मार्ट, स्काई और स्टूडेंट को क्रमशः इस्कूल, इस्त्री, अस्थान, अश्लोक, इस्मृति, अस्थापना, अस्कंद, अस्पष्ट, एस्मार्ट, एस्काई और एस्टुडेंट पढने का प्रचलन बिहार में तो खूब है। ऐसे शब्दों का ग़लत उच्चारण करने वाले को श्याम, स्वामी, स्वाति, क्या, ख्वाब, त्याग आदि बोलकर देखना चाहिए कि वे सीधे आधे अक्षर का उच्चारण तो करते ही हैं। क्या को अक्या और स्वामी को इस्वामी तो कहते नहीं हैं। ध्यान देने पर वे सही उच्चारण करने में कठिनाई महसूस नहीं करेंगे।

उर्दू में पाँच या छह प्रकार के ‘ज’ की परंपरा है। वहाँ सबके उच्चारण में सूक्ष्म अंतर होता होगा और यह सिखाया जाता होगा। यहाँ हम नुक्ते वाले पाँच अक्षरों की बात करेंगे। ‘क़’ का उच्चारण ‘क’ और ‘ख’ के बीच होता है। जीभ को थोड़ा ऊपर ले जाकर हल्का सा मोड़ें, तो नुक्ते वाले अक्षर ठीक-ठीक उच्चारित हो सकते हैं। ख़, ग़, ज़ और फ़ में ह्ह्ह्ह... जैसी आवाज़ निकलती है। अंग्रेज़ी में ज़ और फ़ के उच्चारण मौज़ूद हैं। full को फुल, soft को सॉफ़्ट, film को फ़िल्म, bridge को ब्रिज़, freeze को फ़्रीज़ कहते हैं। jump को जम्प कहेंगे, न कि ज़ंप। कई लोग एलकेजी को एलकेज़ी कहते मिलते हैं, यह ग़लत उच्चारण है। अंग्रेज़ी में ‘क’ के लिए ‘k’, ‘क़’ के लिए ‘q’, ‘फ’ के लिए ‘ph’, ‘फ़’ के लिए ‘f’, ‘ज’ के लिए ‘j’ और ‘ज़’ के लिए ‘z’ इस्तेमाल करते हैं। हालांकि अंग्रेज़ी के शब्दों में क़, ख़, ग़ उच्चारित नहीं होते हैं।

संस्कृत में शब्द के अंत में अकार होने पर ‘अ’ का उच्चारण करते हैं, लेकिन हिन्दी, भोजपुरी, उर्दू आदि में यह परंपरा सामान्य रूप से नहीं है। जैसे हिन्दी में आकाश को आकाश् ही पढ़ते हैं, जबकि संस्कृत में एव को ‘एव्’ नहीं ‘एव’ (अकार के साथ) पढ़ते हैं। संस्कृत, भोजपुरी, हिन्दी आदि में एक अवग्रह चिन्ह (ऽ) भी है, जो s की तरह लिखा जाता है।

हिंदी कठिनता निवारण -3

किस वर्ण का उच्चारण कैसे करें, यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। अक्सर हम देखते हैं कि व्यक्ति अपने क्षेत्रीय उच्चारण से इस कदर घिरा या बँधा रहता है कि उच्चारण का कोई स्पष्ट मानक रूप सामने नहीं आ पाता। कुछ वर्ण तो ऐसे हैं, जिनका उच्चारण अब समाप्ति की ओर है, क्योंकि न तो कोई सिखाने वाला मिलता है, न कोई इतना सीखने के लिए किसी योग्य प्रशिक्षक की तलाश करता है। उच्चारण से यह पता लगता है कि व्यक्ति भाषा को लेकर कितना सजग है। बिहार में इसे लेकर कोई गंभीरता हमें नहीं मिलती। हिन्दी के शिक्षक भी लापरवाही से पेश आते हैं। हम यहाँ व्यंजन, स्वर, अंग्रेज़ी और अरबी से लिए गए अक्षरों के साथ मात्राओं के (जब व्यंजन में लगती हैं तब) उच्चारण पर चर्चा करेंगे।

नागरी के वर्णों के उच्चारण के लिए संस्कृत व्याकरण का उच्चारण-प्रकरण हमारी सहायता करता है। अगर उन छोटे सूत्रों को याद कर लें, तो यह आसान हो जाता है। कंठ से कवर्ग, क़, ख़, ग़, ह, विसर्ग, अ, आ और अंग्रेज़ी के ऑ का उच्चारण होता है। व्यंजनों के स्वरों से स्वतंत्र होने की पुष्टि के लिए एक छोटा-सा खेल खेल सकते हैं। आप अगर जीभ को हाथ की अंगुलियों से पकड़ लें, तो आप पाएंगे कि आप बहुत सारे वर्णों के उच्चारण में असमर्थ हो जाते हैं। ये वर्ण ही व्यंजन हैं। तालु से चवर्ग, ज़, इ, ई, य और श; मूर्द्धा से टवर्ग, र, ष और ऋ; ओठ से पवर्ग, फ़, उ और ऊ; दाँत से तवर्ग, ल, स और लृ; नाक से ङ, ञ, ण, म और न; ए और ऐ कंठ तथा तालु से; व दाँत तथा ओठ से और ओ-औ कंठ और ओठ से उच्चरित होते हैं। यह कठिन लग सकता है लेकिन मुश्किल स, ष, श, न, ण, क़, ख़, ग़, ज़, फ़ आदि के उच्चारण में ही आती है। शेष अक्षरों का उच्चारण विशेष प्रशिक्षण या सतर्कता के बिना कोई भी कर सकता है। ‘ऋ’ और ‘लृ’ की परंपरा संस्कृत से आती है, जो हमारी समझ में बहुत ज़रूरी नहीं रह गई है। ‘लृ’ तो अनुपयोगी ही है। किसी ज़माने में संस्कृतज्ञ इसे ज़रूरी मानते रहे हों, लेकिन आज यह अप्रासंगिक है। ‘स’ का उच्चारण सहज है और ग़लत उच्चारण करने वाले भी इसका सही उच्चारण करते हैं। अतिरिक्त सतर्कता ‘ष’ और ‘श’ में आवश्यक है। मूर्द्धन्य अक्षर यानी ट-ठ-ड-ढ जहाँ से निकलते हैं, वही मूर्धा है और ‘ष’ के लिए आपको वहीं से प्रयास करना होता है। ‘श’ के उच्चारण के लिए च-छ-ज-झ के उच्चारण स्थान यानी तालु की सहायता लेनी पड़ती है। फिर भी ‘ष’ और ‘श’ का उच्चारण ‘श’ के रूप में ही प्रचलित है। ‘ण’ के लिए भी ट-ठ–ड-ढ के उच्चारण स्थान की सहायता लेनी होती है।

तालु वाले वर्ण तालव्य कहे जाते हैं। तालव्य को तालब, तालाबे आदि कहा जाना ग़लत है। इसी प्रकार मूर्धा वाले मूरधन, मूरधने नहीं मूर्धन्य और दाँत वाले दन्ते नहीं, दन्त्य वर्ण कहे जाते हैं।

‘ड़’ के उच्चारण में जीभ ऊपर की ओर मुड़ जाती है। जीभ का ऊपर की ओर मोड़कर ‘ड’ का उच्चारण ‘ड़’ का सही उच्चारण है। ‘वांटेड’ फ़िल्म में सलमान खान ने यह करके बताया है। ‘ढ़’ का उच्चारण ‘र्ह’ है। र्+ह ही ‘ढ़’ है। ढक्कन को ढ़क्कन लिखना ग़लत है। बिन्दी वाला ‘ढ’ यानी ‘ढ़’ ‘ढ’ से अलग वर्ण है। वर्णमाला सिखाते समय ‘ड़’ और ‘ढ़’ टवर्ग में नहीं मिलाने चाहिए। क, ख, ग, घ, ङ यानी कवर्ग के अंतिम अक्षर ‘ङ’ को बहुत-से लोग ‘ड़’ लिख रहे हैं, टवर्ग के ‘ड’ को ‘ड़’ लिख रहे हैं और टवर्ग के ‘ढ’ को ‘ढ़’ लिख रहे हैं। ऐसे लिखना तनिक भी उचित नहीं है। यह ध्यान रखना पड़ेगा कि कवर्ग के ‘ङ’ को ‘ड’ के दायीं ओर बगल में बिन्दु (थोड़े बड़े आकार का हो, तो ठीक रहेगा) लगाकर लिखना चाहिए, जबकि ‘ड़’ को, जिसे बड़ी ‘र’ भी कहते हैं, ‘ड’ के ठीक नीचे बिन्दु लगाकर लिखना चाहिए। इसे विशेष रूप से बच्चों को वर्णमाला सिखाने वालों को ध्यान रखना चाहिए। ‘ढ़’ और ‘ड़’ पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।
लोकभाषाओं में ‘ष’ को ‘ख’ भी कहा जाता है। संतोष को सन्तोख कहना गाँवों में आम बात है। वर्षा से बरखा शायद इसी कारण बना है। भोजपुरी समाज में किसी के मरने के साल भर होने को बरसी न कहकर बरखी कहते हैं। भोजपुरी की पहली वेबसाइट अँजोरिया के संचालक सहित कई विद्वान भोजपुरी में ‘स’ के तीनों रूपों के पक्षधर हैं। जबकि देश, सात और धनुष को भोजपुरी में क्रमशः देस, सात और धनुस कहते हैं। अवधी में तुलसी भी ‘संकर’ का प्रयोग शंकर के लिए करते हैं। हमारी समझ से लोकभाषाओं में एकमात्र ‘स’ की परंपरा को मानना अनुचित नहीं है।


बिहार के सारण प्रमंडल में ही ‘ण’ के ‘न’ और ‘ण’ तथा ‘ड़’ के ‘ड़’ और ‘र’ दोनों उच्चारण मिलते हैं। कुछ लोगों द्वारा ‘ण’ को ‘ड़’ कहा और लिखा जा रहा है, जो ग़लत माना जाएगा। अक्सर लोगों को टिप्पणी को ‘टिप्पड़ी’ लिखते देखा है इंटरनेट की दुनिया में।

प्रिय विरह

शिव विरह गीत कैलाशों पर धूनी जलती, मन में फिर भी शोर है, भोले तेरे बिना ये जीवन जैसे सूना भोर है। गंगा भी अब मौन खड़ी है, चाँद भी फीका...