कई बार जीवन में हम जाने अनजाने में ही अपनी खुशियों को किसी और की भावनाओं से बाँध लेते हैं।
ऐसा लगता है जैसे हमारे भीतर का मौसम अब हमारे नियंत्रण में नहीं रहा।
अगर वह उदास है, तो हमारे अंदर भी एक अजीब सी बेचैनी छा जाती है।
और अगर उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठे, तो हमारे दिल के कोने-कोने में रोशनी फैल जाती है।
फिर समझ आता है कि शायद हम “खुश रहना” नहीं, बल्कि “किसी और के ठीक होने से खुश होना” सीख लेते हैं।
यह एक अनोखा सा संबंध है,जहाँ दो आत्माएँ शब्दों से नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ जाती हैं।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी जन्म लेता है:
क्या हम अपनी खुशी को इतना बाहर रख दें कि वह किसी और के मनोभावों पर निर्भर हो जाए?
शायद असली यात्रा यही है,
प्यार करते हुए भी अपनी रोशनी को भीतर संजोकर रखना।
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