"भ्रम छोड़ दीजिए"
ये मिट्टी के घर भी सिखाते हैं,
हर दीवार दरकती है, हर छत टपकती है।
फिर क्यों हम रिश्तों को पत्थर की लकीर मान लें?
जो कल तक अपना था, आज पराया है,
जो हंसकर मिला था, वो ताना सुनाया है।
तो इस भ्रम को भी अब जाने दीजिए,
कि सब अपने हैं... ये मानना छोड़ दीजिए।
खुश रहना है तो दिल का बोझ हल्का करिए,
उम्मीदों की गठरी को थोड़ा सा झटका करिए।
जो साथ है उसका शुक्रिया करिए,
जो चला गया... उसे अलविदा करिए।
टूटे घर में भी धूप आती है मित्र,
बस खिड़की खोलिए, और भ्रम छोड़ दीजिए।
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