छोड़ दीजिए


छोड़ दीजिए

एक दो बार समझाने से कोई नही समझ रहा है, तो सामने वाले को समझाना छोड़ दीजिए..

बड़े होने पर अगर बच्चे खुद फैंसले लेने लगें, तो उनके पीछे लगना छोड़ दीजिए...

गिने चुने लोगो से आपके विचार मिलते है मगर एक दो से नहीं मिलते तो उन्हें छोड़ दीजिए...

एक उम्र के बाद कोई आपको ना पूछे या कोई पीठ पीछे आपके बारे में गलत कहे, तो दिल पे लेना छोड़ दीजिए...

अपने हाथ में कुछ भी नही है, ये अनुभव आने पर भविष्य की चिंता करना छोड़ दीजिए...

इच्छा और क्षमता में बहुत फर्क पड़ रहा है, तो खुद से अपेक्षा करना छोड़ दीजिए..

हर किसी का जीवन अलग, कद, रंग सब अलग है, इसलिए दूसरों से तुलना करना छोड़ दीजिए...

बढ़ती उम्र में जीवन का आनंद लीजिए, रोज जमा और खर्च करने की चिंता करना छोड़ दीजिए....

अच्छा लगे तो ठीक, न लगे तो हल्के में लेकर छोड़ दीजिए....!!!

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"छोड़ दीजिए"
जो हाथ से फिसल जाए, उसे बहने दीजिए,
जो बात दिल को चुभे, उसे कहने दीजिए।
कल की चिंता, आज का बोझ,
सांस के साथ बस… छोड़ दीजिए।

जो लोग बदल जाएँ, उन्हें बदलने दीजिए,
हर रिश्ते को उम्र भर ढोना ज़रूरी नहीं—ये समझ लीजिए।

जो आपकी कद्र न करें, उनके पीछे क्यों भागना,
खुद को सस्ता बनाना बंद कीजिए।

हर जवाब देना ज़रूरी नहीं होता,
कभी खामोशी भी सबसे सटीक वार होती है।

हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं,
कुछ लड़ाइयाँ छोड़ना ही असली जीत होती है।

जो बीत गया, वो सिखाने आया था—सज़ा देने नहीं,
उसे बार-बार जीना बंद कीजिए।

हर गलती को ढोते रहोगे तो आगे बढ़ोगे कैसे?
थोड़ा खुद को भी माफ़ करना सीख लीजिए।

और सुनिए—
छोड़ना भागना नहीं होता,
कई बार यही सबसे समझदार फैसला होता है।

हर चीज़ पकड़कर रखने की आदत छोड़िए,
तभी हाथ खाली होंगे… कुछ बेहतर पकड़ने के लिए।



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