प्रिय विरह

शिव विरह गीत

कैलाशों पर धूनी जलती,
मन में फिर भी शोर है,
भोले तेरे बिना ये जीवन
जैसे सूना भोर है।

गंगा भी अब मौन खड़ी है,
चाँद भी फीका लगता है,
तेरे विरह में भोलेनाथ,
हर श्वास अधूरा लगता है।

डमरू की वो धुन ना सुनूँ तो,
मन जंगल हो जाता है,
“ॐ नमः शिवाय” जपते-जपते
आँसू ही अभिषेक बन जाता है।

राख लगे उस रूप को ढूँढूँ,
हर मंदिर हर घाट में,
पर शिव मिलते हैं अक्सर
टूटे हुए हालात में।

विरह तेरा भी प्रसाद है भोले,
ये अब मन ने मान लिया,
तू पास नहीं फिर भी मैंने
तुझको अपना मान लिया।

ना मिलने का दुख भी मीठा,
जब नाम तुम्हारा साथ रहे,
शिव प्रेम वही सच्चा है
जो विरह में भी साथ रहे।

– PKS

पंख और घोंसला - एक भूल, हज़ार साल

पंख और घोंसला
एक भूल, हज़ार साल



घोंसला बनाने में हम यूँ मशगूल हो गए,
कि उड़ने को पंख भी थे, ये हम भूल गए।


तिनका-तिनका जोड़ते, हम दीवारें चुनते गए,
खुला पड़ा था आसमाँ, और हम सिमटते गए।


रोटी, कपड़ा, मकान में सपने सब धूल हुए,
उड़ने वाले पंख भी किस्तों में मशगूल हुए।


कल की चिंता ढोते-ढोते आज भी खोता गया,
हँसता चेहरा भीतर ही भीतर चुपचाप रोता गया।


सुरक्षा की चाहत में पिंजरे अच्छे लगने लगे,
खुले गगन से ज़्यादा कमरे अच्छे अपने लगे।


बच्चों की पढ़ाई में अपने अरमान बिखर गए,
ज़िम्मेदारी ढोते-ढोते कितने मौसम गुजर गए।


याद करो वो दिन जब तुम बेख़ौफ़ उड़ा करते थे,
मुट्ठी भर सपनों लेकर बादलों से लड़ा करते थे।


अब भी वक़्त बचा है, पंख अभी बीमार नहीं,
घोंसला ज़रूरी है, पर उड़ना बेकार नहीं।


तोड़ो उन जंजीरों को, जो आदत बन भारी हैं,
ज़िंदगी जीने को मिली है, सिर्फ़ साँसें उधारी हैं।


— प्रमोद कुमार सिंह

मातृ दिवस

पैसे से सब मिल जाता है, पर वो स्पर्श नहीं मिलता,
थके हुए माथे को फिर वैसा हर्ष नहीं मिलता।
दुनिया भर की भीड़ में सब रिश्ते शर्तों वाले हैं,
मां ही बस वो रिश्ता है, जिसके हम मतवाले हैं।

द्वंद्व - एक प्रश्न, हज़ार रातें

द्वंद्व

एक प्रश्न, हज़ार रातें

उसे मैं प्रिय हूँ या नहीं, ये द्वंद्व है मन में रहता है,

यही इक प्रश्न रातों को, मुझे अब जगाने लगता है।

हँसी में उसकी बात करूँ, तो हाँ सा लगने लगता है,

ख़ामोशी में वो जब रहे, तो ना सा लगने लगता है।

नज़र मिले तो फूल खिलें, मन बाग़ सा लगने लगता है,

नज़र फिरे तो हर रिश्ता, वीरान सा लगने लगता है।

वो पास रहे तो हर मौसम, मधुमास सा लगने लगता है,

वो दूर जाए तो जीवन भी, वनवास सा लगने लगता है।

एक पल कह दे “तुम ही तो हो”, सब अपना सा लगने लगता है,

दूजे पल वो चुप हो जाए, सब सपना सा लगने लगता है।

उसकी हाँ में हाँ मिलाऊँ, तो खुद से छलने लगता है,

उसकी ना को सच मानूँ, तो मन ही गलने लगता है।

चाँद से पूछूँ राज़ ये, वो भी ढलने लगता है,

तारों का हर उत्तर मुझको, भ्रम सा लगने लगता है।

दिल से पूछूँ हाल अगर, वो भी जलने लगता है,

तेरा नाम लेते-लेते, स्वर भी थमने लगता है।

भीड़ भरे इन रास्तों में, तनहा चलने लगता है,

अपना ही साया अब मुझसे, कुछ-कुछ डरने लगता है।

तेरी यादों का हर मौसम, आँख भिगोने लगता है,

सूखा मन भी तेरे कारण, दरिया होने लगता है।

न कह सकता हूँ बात ये, होंठ सिले से लगने लगता हैं,

न सह सकता हूँ घात ये, घाव खुले से लगने लगे हैं।

बस एक जवाब की आस में, हर लम्हा खलने लगा है,

कि उसे मैं प्रिय हूँ या नहीं, ये द्वंद्व कलेजा निगलने लगा है।

ऐ काश वो कह दे इक बार — “हाँ, तुम भी तो प्रिय हो”,

तो ये रातों का जगना भी, सवेरा सा लगने लगा है।

वरना ये प्रश्न अधूरा सा, साँसों को छलने लगा है,

और ये द्वंद्व मुझे हर दिन, थोड़ा-थोड़ा मरने लगा है।


— प्रमोद कुमार सिंह

मर्द की थकी हुई मुस्कान






सुबह-सुबह फिर निकल पड़ा वो,
कंधों पर संसार लिए,
अपने हिस्से धूप न माँगी,
सबके लिए बहार लिए।

घर की खुशियों की खातिर ही,
हर दर्द दबाना पड़ता है,
मर्द को अक्सर हँसते-हँसते
अंदर से मरना पड़ता है।

माँ की दवा, बच्चे की फीस,
बाप की उम्मीदें साथ,
पत्नी के सपनों की खातिर
दिन और रात एक किये।

अपने जख्म छुपाकर वो तो
सबको हिम्मत देता है,
टूटी चप्पल, थका बदन फिर
रोटी का वादा देता है।

कौन समझता उसकी चुप्पी,
कौन पढ़े मन की भाषा,
सबको बस मजबूत दिखे वो,
भीतर टूटी हर आशा।

रोना चाहे तो भी आखिर
आँसू पी जाना पड़ता है,
मर्द को अक्सर किस्मत से
हर दिन लड़ जाना पड़ता है।

ना कोई माला, ना ताली,
ना कोई सम्मान मिला,
बस जिम्मेदारी के बदले
जीवन भर का काम मिला।

फिर भी चेहरे पर मुस्कानें
घर की खातिर रखता है,
अपने सपनों की चिता पर
सबका भविष्य लिखता है।

ईश्वर उससे पूछे एक दिन —
“थककर आखिर क्या पाया?”
वो हँसकर बस इतना बोले —
“अपनों को खुश देख पाया।”

यही जीत है, यही कमाई,
यही उसका अभिमान रहा,
दुनिया चाहे कुछ भी समझे,
मर्द सदा बलिदान रहा।

— प्रमोद कुमार सिंह

तुम दिल में रहो

“तुम दिल में रहो” 

💞
रिश्ता बनाया है तो निभाएँगे,
हर मोड़ पे साथ ही आएँगे।
तुमसे ही रूठेंगे हम कभी,
तुमको ही फिर से मनाएँगे।।
🌸
तुम दिल में रहो इतना ही बहुत,
साँसों में महकते रहना तुम।
दूरी चाहे जितनी भी हो,
आँखों में चमकते रहना तुम।।

💞
तुमसे बातें, तुमसे शिकवे,
तुमसे ही हर अफ़साना है।
भीड़ भरी इस दुनिया में,
बस तेरा साथ सुहाना है।।

💞
कभी हँसी बनकर आ जाना,
कभी आँसू बन बह जाना।
अगर कभी हम खो भी जाएँ,
तुम बनकर राह दिखाना।।

💞
मुलाक़ातों की चाह नहीं,
बस एहसास तुम्हारा काफी है।
दिल के इस छोटे से घर में,
एक नाम तुम्हारा काफी है।।

💞
तुमसे ही लड़ना अच्छा लगे,
तुमसे ही प्यार जताएँगे।
ये रिश्ता साँसों जैसा है,
मरते दम तक निभाएँगे।।
💞
तुम दिल में रहो इतना ही बहुत,
मिलने की कोई ज़रूरत नहीं।
कुछ रिश्ते रूह में बसते हैं,
उनकी कोई दूरी नहीं।।
— प्रमोद कुमार सिंह द्वारा प्रस्तुति

प्रकृति रोती है

फूल समझते तितली का दु:ख, खुद को चूस जाने देते।

पत्ते समझते पेड़ का दु:ख खुद, को झर जाने देते।

पहाड़ समझते नदियों का दु:ख, खुद को पीस जाने देते।

बाती समझती दीपक का दु:ख, खुद को जल जाने देती।

आसमान समझता धरती का दु:ख, खुद को बरस जाने देता।

सूरज समझता रात का दु:ख, खुद को जल जाने देता।

धागा समझता माला का दुख, खुद को बन्ध जाने देता।

साज समझता राग का दुख, खुद को बज जाने देता।

पर देखो विधि का कैसा खेल, कैसा ये संसार है,

मानव ही न समझे मानव का दुःख, ये कैसा व्यवहार है? 


दिल सीने में धड़कता नहीं, आंखों में नमी नहीं,

दूसरे के जख्मों पर मरहम रखने की कमी नहीं। 


पास बैठे हैं पर कोसों दूर, बातें हैं पर मौन है,

आंसू गिरें तो हंसी उड़े,  ये कैसा दौर है? 


इसीलिए तो तोड़ा मैंने जग से नाता सारा,  

जब मेरे किस्से का हर किरदार निकला गद्दारा।


अब समझ गया हूं मैं जग का सारा लेखा-जोखा,

कि प्रकृति रोती है साथ में, सबका दुःख है धोखा।


पर इंसान हंसता है लाश पे, जश्न मनाता मातम में, 

इसीलिए तो त्याग दिया मोह, जी रहा हूं खातम में।

पर मानव न समझे मानव का दु:ख, दिल है पर धड़कता ही नहीं।

मानव दूसरे के दुःख में सिहरता नहीं।

कोई बात बने


कोई बात बने

मेरे लिखने से क्या, जो तुम ना पढ़ो,  
तुम पढ़ लो जरा तो कोई बात बने।

मेरे सोचने से क्या, जो तुम ना समझो,  
तुम समझ लो जरा तो कोई बात बने।

मैं चुप रहूं तो क्या, जो तुम ना बोलो,  
तुम बोल दो जरा तो कोई बात बने।

मैं फूल बनूं तो क्या, जो महक ना आए,  
तुम खुशबू बनो तो कोई बात बने।

मेरे चाहने से क्या, जो एहसास ना हो,  
तुम महसूस करो तो कोई बात बने।

मैं बेरंग रहूं तो क्या, जो तुम ना रंगो,  
तुम रंग भरो तो कोई बात बने।

मेरे हाथ बढ़े तो क्या, तुम रुके रहो,  
तुम भी हाथ बढ़ाओ तो कोई बात बने...!!


मनमीत


आप प्रेम हो, प्रीत हो, मनमीत हो हमारे,  
सूने समरस जीवन में संगीत हो हमारे।  
धड़कन-धड़कन में बसा नाम है आपका,  
श्वास-श्वास की सरगम में गीत हो हमारे।

थक कर जब निगाहें राहों में खो जाएं,  
आप ही जीत हो, आप ही हार हो हमारे।  
अंधियारों में बनकर उजाला आप आए हो, 
प्रत्येक नव प्रभात का त्योहार हो हमारे।

मन के मरुस्थल में बन फूल आप महको,  
सपनों की डाली पर सँजे ख्वाब हो हमारे।
एहसासों से जीवन को सजा दिया तुमने,  
आप बिन सूने थे सब किस्से-प्यार के हमारे।

साथ हो तो लगता हर पीड़ा मधुर है,  
आप बिन अधूरी हर इक रीत हो हमारी।  
आपसे ही भरते हैं हर घाव हमारे,  
आप ही मन भाव और संसार हो हमारे।  

दूर जाओ तो विरह भी रीत सिखाए,  
आप बिन हर पल लगता अतीत हो हमारे।
लौट आओ तो खुशबू से भर जाए जग,  
शून्य में आप ही चांद और तारे हो हमारे। 

आप प्रेम हो, प्रीत हो, मनमीत हो हमारे,  
इस जन्म नहीं, हर जन्म मीत हो हमारे।  
रहना यूं ही हरदम इस दिल के पास आप,  
जीवन की हर डगर में आधार हो हमारे।


आंचल सा स्पर्श

🌙

आंचल सा स्पर्श

वो हारा हुआ नहीं था, 
बस थका हुआ था बहुत... 
दुनिया की जंग लड़ते-लड़ते 
कंधे झुक गए थे चुपचाप।

फिर अचानक 
उसके कंधे पर एक हाथ रखा गया 
न बोली कुछ, न पूछा हाल 
बस रख दिया... जैसे रख देती है 
माँ, बिलखते बच्चे पर आंचल।

उस एक कोमल स्पर्श में 
सारे युद्ध हार जाना कबूल था,
सारी मर्दानगी पिघल जाना मंजूर था। 

क्योंकि हताश पुरुष को 
मनचाही स्त्री का हाथ 
समंदर में डूबते को 
किनारा सा लगता है...।

वो पल में बच्चा हो गया 
और उसकी हथेली 
पूरी कायनात हो गई।


प्रेम सरोवर

जानते हो …
प्रेम एक बार उतर जाए तो
सिर्फ़ याद नहीं बनता,
वह आदत, 
आदर और आत्मा का हिस्सा हो जाता है।

वह चला भी जाए
तो भीतर एक कमरा छोड़ जाता है
जहाँ स्मृतियाँ साँस लेती रहती हैं।

प्रेम की मृत्यु दरअसल
पूर्ण अंत नहीं होती,
वह हमें थोड़ा-सा अधूरा छोड़ जाती है।

हर बार जब प्रेम मरता है,
हम जीते तो रहते हैं…
पर भीतर कहीं
एक धड़कन हमेशा के लिए
चुप हो जाती है।

…और सच ये है—
वही चुप धड़कन
हमें उम्र भर सुनाई देती रहती है।

हम हँसते हैं, मिलते हैं, आगे बढ़ते हैं,
पर किसी मोड़ पर अचानक
वो नाम फिर से दिल में उतर आता है।

नया प्रेम आता भी है तो
पुराने की जगह नहीं लेता,
बस उसके बगल में
एक और कमरा बना देता है।

और इंसान…
पूरा कभी नहीं भरता फिर,
बस जीना सीख जाता है
उन अधूरे कमरों के साथ।

........ ✍️

भ्रम छोड़ दीजिए




"भ्रम छोड़ दीजिए"
ये मिट्टी के घर भी सिखाते हैं,  
हर दीवार दरकती है, हर छत टपकती है।  
फिर क्यों हम रिश्तों को पत्थर की लकीर मान लें?

जो कल तक अपना था, आज पराया है,  
जो हंसकर मिला था, वो ताना सुनाया है।  
तो इस भ्रम को भी अब जाने दीजिए,  

कि सब अपने हैं... ये मानना छोड़ दीजिए।

खुश रहना है तो दिल का बोझ हल्का करिए,  
उम्मीदों की गठरी को थोड़ा सा झटका करिए।  
जो साथ है उसका शुक्रिया करिए,  
जो चला गया... उसे अलविदा करिए।

टूटे घर में भी धूप आती है मित्र,  
बस खिड़की खोलिए, और भ्रम छोड़ दीजिए।



भावना का मिलन

कई बार जीवन में हम जाने अनजाने में ही अपनी खुशियों को किसी और की भावनाओं से बाँध लेते हैं।

ऐसा लगता है जैसे हमारे भीतर का मौसम अब हमारे नियंत्रण में नहीं रहा।
अगर वह उदास है, तो हमारे अंदर भी एक अजीब सी बेचैनी छा जाती है।
और अगर उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठे, तो हमारे दिल के कोने-कोने में रोशनी फैल जाती है।

फिर समझ आता है कि शायद हम “खुश रहना” नहीं, बल्कि “किसी और के ठीक होने से खुश होना” सीख लेते हैं।

यह एक अनोखा सा संबंध है,जहाँ दो आत्माएँ शब्दों से नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ जाती हैं।
लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी जन्म लेता है:
क्या हम अपनी खुशी को इतना बाहर रख दें कि वह किसी और के मनोभावों पर निर्भर हो जाए?

शायद असली यात्रा यही है,
प्यार करते हुए भी अपनी रोशनी को भीतर संजोकर रखना।

💫⚡️

छोड़ दीजिए


छोड़ दीजिए

एक दो बार समझाने से कोई नही समझ रहा है, तो सामने वाले को समझाना छोड़ दीजिए..

बड़े होने पर अगर बच्चे खुद फैंसले लेने लगें, तो उनके पीछे लगना छोड़ दीजिए...

गिने चुने लोगो से आपके विचार मिलते है मगर एक दो से नहीं मिलते तो उन्हें छोड़ दीजिए...

एक उम्र के बाद कोई आपको ना पूछे या कोई पीठ पीछे आपके बारे में गलत कहे, तो दिल पे लेना छोड़ दीजिए...

अपने हाथ में कुछ भी नही है, ये अनुभव आने पर भविष्य की चिंता करना छोड़ दीजिए...

इच्छा और क्षमता में बहुत फर्क पड़ रहा है, तो खुद से अपेक्षा करना छोड़ दीजिए..

हर किसी का जीवन अलग, कद, रंग सब अलग है, इसलिए दूसरों से तुलना करना छोड़ दीजिए...

बढ़ती उम्र में जीवन का आनंद लीजिए, रोज जमा और खर्च करने की चिंता करना छोड़ दीजिए....

अच्छा लगे तो ठीक, न लगे तो हल्के में लेकर छोड़ दीजिए....!!!

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"छोड़ दीजिए"
जो हाथ से फिसल जाए, उसे बहने दीजिए,
जो बात दिल को चुभे, उसे कहने दीजिए।
कल की चिंता, आज का बोझ,
सांस के साथ बस… छोड़ दीजिए।

जो लोग बदल जाएँ, उन्हें बदलने दीजिए,
हर रिश्ते को उम्र भर ढोना ज़रूरी नहीं—ये समझ लीजिए।

जो आपकी कद्र न करें, उनके पीछे क्यों भागना,
खुद को सस्ता बनाना बंद कीजिए।

हर जवाब देना ज़रूरी नहीं होता,
कभी खामोशी भी सबसे सटीक वार होती है।

हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं,
कुछ लड़ाइयाँ छोड़ना ही असली जीत होती है।

जो बीत गया, वो सिखाने आया था—सज़ा देने नहीं,
उसे बार-बार जीना बंद कीजिए।

हर गलती को ढोते रहोगे तो आगे बढ़ोगे कैसे?
थोड़ा खुद को भी माफ़ करना सीख लीजिए।

और सुनिए—
छोड़ना भागना नहीं होता,
कई बार यही सबसे समझदार फैसला होता है।

हर चीज़ पकड़कर रखने की आदत छोड़िए,
तभी हाथ खाली होंगे… कुछ बेहतर पकड़ने के लिए।



राधा की विडंबना


वो 'युग' और था,
ये युग और है।

तब 'राधा' होना पूज्य था,
अब 'राधा' होना हेय है।

तुम विकल्प ही रहोगी,
प्राथमिकता न हो पाओगी...!

एक पुरुष होकर जो स्त्री की
'मित्रता' की मर्यादा समझे,
निस्वार्थ प्रेम से उसे पोषित करे,
समाज की दूषित नजरों से बचाकर
अपने हृदय में अक्षुण्ण रखे—

वो मित्र कहाँ से लाओगी?
वो 'कृष्ण' कहाँ से लाओगी?
तुम कलयुग की राधा हो,
तुम पूज्य न हो पाओगी...!

कितना भी आलौकिक और नैतिक प्रेम हो तुम्हारा,
तुम दैहिक पैमाने पर नाप दी जाओगी...!

तुम मित्र ढूंढोगी,
वे प्रेमी बनना चाहेंगे,

तुम आत्मा सौंप दोगी,
वे देह पर घात लगाएंगे...
पूर्ण समर्पित होकर भी तुम 'राधा' ही रहोगी,
'रुक्मिणी' न बन पाओगी...!

“राधा प्रेम है—अनंत, निष्कलुष,
रुक्मिणी सामाजिक स्वीकृति है,
इस युग में लोग प्रेम नहीं,
स्वीकृति के पीछे भागते हैं...”

पर सत्य इतना एकांगी भी नहीं—
हर कहानी में एक पक्ष नहीं होता...
“हर पुरुष ‘कृष्ण’ नहीं, ये सत्य है,
पर हर पुरुष ‘दुर्योधन’ भी नहीं...”
कुछ दोष काल का भी है,

कुछ हमारी पहचान का भी—
हमने चेहरे देखे, इरादे नहीं,
शब्द सुने, सच्चाई नहीं...

अब प्रेम नहीं, विकल्पों का बाजार है,
हर दिल के पीछे एक विकल्प तैयार है।

यहाँ भावनाएँ नहीं, सौदे चलते हैं,
और रिश्ते भी शर्तों पर पलते हैं...

यहाँ प्रेम प्रमाण माँगता है,
विश्वास सवालों में तौला जाता है,

और जो आत्मा की भाषा बोले—
उसे अक्सर पागल कहा जाता है...
तुम राधा बनना चाहोगी,
पर युग तुम्हें समझेगा नहीं,
तुम प्रेम लिखोगी,
पर समाज उसे पढ़ेगा नहीं...।

क्योंकि यहाँ पूजा नहीं,
प्रदर्शन देखा जाता है,
और प्रेम नहीं—
उसका परिणाम देखा जाता है...

फिर भी अगर प्रेम करना—
तो राधा की तरह करना,
बिना शर्त, बिना स्वार्थ, बिना भय...
क्योंकि इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है—
लोग प्रेम चाहते हैं,
पर प्रेम करने का साहस नहीं रखते...

पुत्र वैभव के लिए

एक ऐसा पुरुष बनना तुम—
जो विपरीत परिस्थितियों में परुष हो,
जो अपने हालातों को दोष देने के बजाय
उन्हें बदलने की आदत रखता हो।
जिसके कदमों में मेहनत की ठसक हो,
मस्तिष्क में समझ और दूरदर्शिता हो 
जिसकी जेब भले भारी न हो,
पर कमाई साफ हो—
और नज़र झुकी न हो।
जो बोलने से पहले समझे,
और समझने के बाद डटे।
जिसके लिए स्त्री “सम्मान” का शब्द नहीं,
व्यवहार हो।
चेहरे पर सुकून भरा आत्मविश्वास
जो क्रोध में भी सीमा न लांघे,
और ताकत होने पर भी
उसका दिखावा न करे।
जो जिम्मेदारी से भागे नहीं—
उसे उठाए, निभाए, और चुपचाप पूरा करे।
क्योंकि असली पहचान शोर से नहीं बनती,
चरित्र से बनती है।

कबीर का अहंकार


कबीर के जीवन का एक सूत्र है मुक्ति। सूत्र का अर्थ अत्यंत संक्षिप्त, सारगर्भित और गूढ़ ज्ञान प्रदान करने वाला नियम या धागा है, जो बड़ी बातों को कम शब्दों में समझाता है। यह ज्ञान को पिरोने वाला (धागे की तरह) आधार है।

 जिसमें अर्थ की गहराई और अध्यात्म की ऊंचाई दोनों अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त है। कबीर और रविदास, एक ही गुरु के शिष्य काशी के निवासी, सड़क वासी।

 कबीर से ज्यादा साधारण आदमी संसार में खोजना कठिन है और अगर कबीर मुक्ति तक पहुंच सकते हैं, तो हम सभी पहुंच सकते हैं। 

क्या काशी क्या ऊसर मगहर,

राम हृदय बस मोरा।

 जो कबीरा काशी मरै 

रामै कौन निहोरा।।


कबीर निपट अनपढ़ और गंवार हैं, 

मसि कागद छूवों नहीं, कलम गहो नहिं हाथ।

इसलिए गंवार के लिए भी आशा है; मुक्ति की।



कबीर की जाति-पांति का तो ठिकाना  है लेकिन ठौर नहीं  है – हिंदू के गर्भ से पैदा हुए,  मुसलमान के घर पले बढ़े। वह प्रेम की पैदाइश थे “ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पण्डित होय” जाति-पांति से परमात्मा का कुछ लेना-देना नहीं है। 


जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।


कबीर जीवन भर गृहस्थ रहे--जुलाहे-बुनते रहे कपड़े और बेचते रहे; 

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाये॥


वो हिमालय नहीं गये क्योंकि उनका परमात्मा घर पर भी आ सकता है, 

नैना अंतरि आव तूं,  ज्यूं हौं नैन झंपेऊँ |

       ना हौं  देखौं  और कूं , ना तुझ देखन देऊँ ||17 ||



हिमालय जाना आवश्यक नहीं। कबीर ने काशी ही नहीं, कुछ भी नहीं छोड़ा और सब कुछ पा लिया घर बैठे। 

बहुत दिनन थैं मैं प्रीतम पाये, भाग बड़े घरि बैठे आये॥


इसलिए कबीर की दृष्टि में छोड़ना पाने की शर्त नहीं हो सकती। कबीर के पास एक साधारण-सी पत्नी है, और जान गये कि सब राग-रंग, सब वैभव-विलास, सब सौंदर्य मन की ही कल्पना है।

 कबीर के अनुसार जब मन के अंदर से अहंकार, लोभ, मोह, और भय खत्म हो जाएँ—वही असली मुक्ति है।

मरने के बाद कुछ मिलने का इंतज़ार करना उनके अनुसार भागना है, समाधान नहीं।

“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं”

मतलब—जब तक “मैं” (अहंकार) था, तब तक ईश्वर नहीं दिखा।

जैसे ही “मैं” खत्म हुआ, वही मुक्ति है।


कबीर बार-बार कहते हैं कि इंसान अपनी पहचान—जाति, धर्म, पद, शरीर—इन सब में फँसा हुआ है।
मुक्ति, इन झूठी परतों से बाहर निकलना है।
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर”
मतलब—शरीर मरता है, पर मन और माया नहीं मरते।
तो असली काम शरीर छोड़ना नहीं, मन को जीतना है।

कबीर के यहाँ गुरु कोई पूजा का पात्र नहीं, बल्कि जागने का माध्यम है।
मुक्ति तभी जब तुम खुद को पहचान लो।
"बलिहारी गुरु आपणै...",
"सतगुरु की महिमा आनंत.."
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े…”

यहाँ गुरु इसलिए बड़ा है क्योंकि वो तुम्हें तुम्हारे असली स्वरूप तक पहुँचाता है।

कबीर मंदिर-मस्जिद, कर्मकांड, दिखावे—सबको सीधे काट देते हैं।
“पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ…”
ज्ञान किताबों से नहीं, अनुभव से आता है—और वही मुक्ति देता है।
और अंत में सबके मुक्ति की कामना करते हैं सबके कल्याण की कामना करते हैं और कहते हैं "कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर....
इससे बड़ी लोकमंगल, लोककल्याण और लोकमुक्ति का मार्ग क्या हो सकता है।

कबीर ने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया- और जिसने परमात्मा के परम ज्ञान को पा लिया उसका बड़ा भरोसा बढ़ता है।  तब इस दुनिया में अगर तुम वंचित हो तो अपने ही कारण वंचित हो, परिस्थिति को दोष मत देना। जब भी परिस्थिति को दोष देने का मन में भाव उठे, कबीर का ध्यान करना। कम से कम मां-बाप का तो तुम्हें पता है, घर-द्वार तो है, तालाब के किनारे पैदा होते ही फेंके तो नहीं गए। हस्ताक्षर तो कर ही लेते हो। थोड़ी-बहुत शिक्षा हुई है, हिसाब-किताब रख लेते हो। वेद, कुरान, गीता भी थोड़ी पढ़ी है। न सही बहुत बड़े पंडित, छोटे-मोटे पंडित तो तुम भी हो ही। तो जब भी मन होने लगे परिस्थिति को दोष देने के बजाय कबीर का ध्यान करना। बुद्ध और महावीर से ज्यादा कारगर हैं कबीर। बुद्ध और महावीर थोड़े-से लोगों के काम के हो सकते हैं। कबीर राजपथ हैं। बुद्ध का मार्ग बड़ा संकीर्ण है; उसमें थोड़े ही लोग पा सकेंगे, पहुंच सकेंगे। बुद्ध और महावीर की भाषा भी उन्हीं की है--चुने हुए लोगों की। एक-एक शब्द बहुमूल्य है; लेकिन एक-एक शब्द सूक्ष्म है। कबीर की भाषा सबकी भाषा है--बेपढ़े-लिखे आदमी की भाषा है। अगर तुम कबीर को न समझ पाए, तो तुम कुछ भी न समझ पाओगे। कबीर को समझ लिया, तो कुछ भी समझने को बचता नहीं और कबीर को तुम जितना समझोगे, उतना ही तुम पाओगे कि मुक्ति का कोई भी संबंध परिस्थिति से नहीं। मुक्ति तुम्हारी भीतर की अभीप्सा पर निर्भर है--और कहीं भी घट सकता है; झोपड़े में, महल में, बाजार में, हिमालय पर; पढ़ी-लिखी बुद्धि में, गैर-पढ़ी-लिखी बुद्धि में, गरीब को, अमीर को; पंडित को, अपढ़ को; कोई परिस्थिति का संबंध नहीं है।       

पागल मन का पागलपन

बावरा मन निकला था, एक अधूरा ख्वाब लिए,
भीड़ भरे इस जग में, खुद से ही सवाल लिए।

कभी शांति की तलाश में, कभी प्रेम के जाल में,
खुद को ही ढूंढता रहा, अपने ही बवंडर हाल में।

ये प्यास भी अजीब है, बुझती नहीं किसी रीत से,
ये आस भी बावरी है, जुड़ती नहीं किसी प्रीत से।

जब थक कर बैठा मन, सन्नाटे की छांव में,
तब जाना—जिसे ढूंढा, वो था अपने ही गाँव में।

महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण”


महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण: एक त्रुटिपूर्ण महानता की गाथा”



लेखक- प्रमोद कुमार सिंह (प्रवक्ता)  
श्री शिवदान सिंह इंटर कॉलेज, इगलास, अलीगढ़



प्रथम सर्ग: जन्म और अपमान
जग के नभ में जब भी उगता, तेजस्वी स्वर्णिम भान,
उसकी एक किरण धरती पर बन जाती पहचान।
वही किरण थी कर्ण, धरा पर आया अग्नि-प्राण,
पर जन्मते ही छिन गया उससे अपना मान।
वेदों की उस पुण्य धरा पर, कुल का भारी भार,
नारी के पग बाँध रहा था समाजों का जाल अपार।
कुंती के अंतर में कौतूहल था, वरदानों का खेल,
सूर्य को पुकारा, और नियति ने लिख दिया झमेल।
आया बालक दिव्य कवच में, कुंडल स्वर्ण-विभूषित,
जगमग करता तेज मानो सूर्य स्वयं अवतीर्णित।
पर माँ की आँखों में डर था, लोक-लाज का शूल,
ममता हार गई उस क्षण, समाज रहा प्रतिकूल।
काँप उठी ममता की धारा, डोली अंतः की आस,
टोकरी में रख दिया पुत्र, करके हृदय उदास।
गंगा की लहरों पर छोड़ा, भाग्य के हवाले,
माँ की छाया छूट गई, जीवन के पहले छाले।
लहरें बोलीं—“हे मानव! यह कैसा तेरा धर्म?
निर्दोषों को दंड दे, कैसा तेरा कर्म?”
नभ चुप था, धरती मौन, सबने देखा खेल,
भाग्य लिख रहा था तब, जीवन का अनमेल।
बहते-बहते पहुँचा शिशु, साधारण से द्वार,
जहाँ न राजसी वैभव था, न सिंहासन का प्यार।
अधिरथ ने देखा, ठिठक गया क्षणभर,
“यह बालक साधारण नहीं”—मन में उठा सागर।
राधा की आँखों में उमड़ा, वर्षों का अभाव,
निःसंतान हृदय को मिल गया, जैसे जीवन-प्रभाव।
गोद में लेकर बोली वह—“अब तू मेरा लाल,”
ममता ने उस दिन जीत लिया, समाज का हर जाल।
नाम पड़ा वसुसेन तब, भाग्य नया आकार,
पर जन्म की छाया रही, हर पल उसके पार।
स्नेह मिला भरपूर उसे, पर सत्य रहा अनजान,
वह खोजता रहा जीवन भर—“मैं हूँ आखिर कौन?”
बचपन बीता साधारण, पर भीतर ज्वाला थी,
हर ताने ने उसकी आत्मा में चिंगारी जला दी।
“सूतपुत्र!”—यह शब्द बना, जैसे विष का बाण,
हर बार वही घाव करे, हर बार अपमान।
विद्यालय में जब पहुँचा वह, लेकर स्वप्न विशाल,
अर्जुन खड़ा था वहाँ, गौरव का था जाल।
कौशल में जब कर्ण बढ़ा, सबको हुआ अचंभा,
पर जन्म ने फिर रोक लिया, बना दिया उसे अंशमा।
“वंश बताओ!”—यह प्रश्न बना, प्रतिभा का अपमान,
धनुष झुक गया उस क्षण, झुक गया उसका मान।
भीड़ हँसी, गुरु चुप रहे, ताना बना प्रमाण,
कर्ण अकेला खड़ा रहा, लेकर अपना अभिमान।
उस दिन भीतर कुछ टूट गया, कुछ जलकर राख हुआ,
एक बालक योद्धा बन गया, मन में गहरा घाव हुआ।
उसने प्रण किया उसी क्षण—“अब रुकना नहीं मुझे,”
“इस जग में पहचान बनानी, झुकना नहीं मुझे।”
पर भाग्य हँसा फिर एक बार, खेल दिखाया नया,
मित्र बनकर आया वहाँ, जिसने सब बदल दिया।
दुर्योधन ने हाथ बढ़ाया, बोला—“तू वीर महान,”
“आज से तू अंग का राजा, तेरा ऊँचा मान।”
सिंहासन से बढ़कर उस दिन, मिला उसे सम्मान,
पहली बार किसी ने देखा, उसका सच्चा मान।
उसने मित्रता में पाया, जीवन का आधार,
पर यहीं से शुरू हुआ, उसका भीषण संहार।
क्योंकि मित्रता थी उस राह पर, जहाँ अंधेरा था,
जहाँ नीति नहीं, केवल सत्ता का फेरा था।
कर्ण समझता था सब कुछ, फिर भी साथ निभाया,
क्योंकि जिसने अपनाया था, उसे कभी न ठुकराया।



महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण”
द्वितीय सर्ग: शिक्षा, शाप और संघर्ष

धधक रही थी अंतर्मन में, ज्वाला अटल, प्रखर,
अपमानों की राख तले था, दावानल सा स्वर।
वसुसेन अब कर्ण बना था, व्रत था एक महान—
“धनुर्विद्या में श्रेष्ठ बनूँगा, चाहे टूटे प्राण!”
गुरुकुल की चौखट पर पहुँचा, लेकर दृढ़ अभिलाष,
पर हर द्वार पर खड़ा मिला, जन्म का ही त्रास।
“कुल बताओ!”—वही पुराना, निर्दयी सा प्रश्न,
प्रतिभा फिर झुक गई वहाँ, टूट गया हर यश।
तब उसने ठाना—“छल ही सही, ज्ञान मुझे पाना है,”
“यदि जग सत्य न स्वीकारे, तो सत्य छुपाना है।”
चल पड़ा वह उस वन की ओर, जहाँ तप का था राज,
जहाँ क्रोध अग्नि में ढलता था, बनकर दिव्य समाज।
वहाँ विराजे थे गुरु प्रखर, तप के धनी महान,
परशुराम—जिनका तेज स्वयं था प्राण।
ब्राह्मणों को देते थे वे, अस्त्रों का वरदान,
क्षत्रियों से था बैर उन्हें, यह जग का था ज्ञान।
कर्ण गया उनके समक्ष, झुककर बोला शांत,
“मैं ब्राह्मण हूँ, ज्ञानार्थी हूँ, करूँ तपस्या अनंत।”
झूठ था वह, पर भीतर उसकी थी साधना सच्ची,
आँखों में तप, वाणी में धैर्य, दृढ़ता थी अटूट कच्ची।
परशुराम ने देखा उसमें, तप का गहरा रंग,
शिष्य बना लिया उसे, शुरू हुआ नया प्रसंग।
अस्त्र-शस्त्र की वर्षा हुई, ज्ञान का खुला द्वार,
कर्ण बना वह धनुर्धर, जिसका न कोई पार।
धनुष की प्रत्यंचा गाती थी, जब उसके हाथों में,
लक्ष्य स्वयं झुक जाता था, उसकी ही बातों में।
वह अर्जुन से कम न था, शायद अधिक प्रखर,
पर भाग्य खड़ा था सामने, बनकर कठोर शिखर।
एक दिवस की बात है, तप का था गंभीर क्षण,
गुरु लेटे थे उसकी गोद में, शांत था वन-गगन।
तभी नियति ने वार किया, बनकर भयंकर दंश,
कीट बना वह काल वहाँ, लेकर पीड़ा का अंश।
मांस चीरता, रक्त बहाता, पीड़ा असह्य अपार,
पर कर्ण अडिग बैठा रहा, न निकली कोई पुकार।
सोचा—“यदि हिला मैं तनिक, गुरु की नींद टूटेगी,”
“ज्ञान की यह अमूल्य निधि, मुझसे फिर छूटेगी।”
रक्त बहा, पीड़ा जली, पर धैर्य रहा अडिग,
मानव नहीं, वह अग्नि बना था, तप का दृढ़ तरंग।
परशुराम जब जाग उठे, देखा वह दृश्य महान,
पर साथ ही पहचान लिया—“यह ब्राह्मण नहीं, वीर क्षत्रिय समान!”
क्रोध जला उनकी आँखों में, वज्र-सा गिरा वचन—
“जिस ज्ञान को तूने पाया, छल से किया अर्जन!”
“जब सबसे अधिक ज़रूरत होगी, भूल जाएगा तू,”
“तेरा अस्त्र उसी क्षण होगा, तुझसे ही बेगाना तू!”
यह शाप नहीं, वज्रपात था, भाग्य पर प्रहार,
कर्ण खड़ा था मौन वहाँ, टूट गया संसार।
जिस ज्ञान के लिए झेला था, उसने यह अपमान,
वही ज्ञान अब बन गया, उसके लिए अभिशाप।
पर कर्ण न रुका, न झुका, न टूटा उस दिन भी,
वह आग थी, जो राख से उठती है हर क्षण ही।
उसने स्वयं से कहा—“अब भाग्य से युद्ध करूँगा,”
“हर बंधन तोड़, अपना पथ स्वयं गढ़ूँगा।”
पर यह कथा यहीं नहीं थी, नियति का खेल शेष,
एक और वज्र गिरना था, जीवन पर अवशेष।
एक बार अभ्यास करते, निकला उसका बाण,
अनजाने में गिर पड़ा, एक गौ का प्राण।
ब्राह्मण आया क्रोध में भर, बोला काँपते स्वर—
“निर्दोष की हत्या की तूने, यह कैसा तेरा कर्म?”
“जैसे मेरी गौ गिरी, असहाय और लाचार,”
“वैसे ही गिरेगा तू भी, रण में होकर बेकार!”
दूसरा शाप भी मिल गया, भाग्य हुआ और कठोर,
हर दिशा में खड़ा दिखा अब, संकट का ही शोर।
एक ओर गुरु का अभिशाप, दूसरी ओर यह वार,
कर्ण का जीवन बन गया, संघर्षों का आधार।
पर सोचो ज़रा, यही क्षण था जहाँ फर्क दिखा,
कोई और होता तो टूट जाता, बैठ जाता वहीं सिसक।
पर कर्ण नहीं था साधारण, वह वज्रों का बना था,
हर चोट ने उसे और अधिक प्रखर बना दिया था।
उसने कहा—
“यदि भाग्य मुझे हराएगा, तो मैं फिर उठ जाऊँगा,”
“यदि शाप मुझे गिराएगा, तो मैं फिर मुस्काऊँगा।”
“मेरा अस्तित्व शापों से नहीं, मेरे कर्मों से है,”
“मैं वही बनूँगा जो मैं ठानूँ—यह संकल्प मेरे दम से है!”
अब वह लौट चुका था, बनकर पूर्ण धनुर्धर,
पर भीतर था द्वंद्व गहरा, मन था अत्यंत प्रखर।
उधर खड़ा था अर्जुन, गुरुजनों का अभिमान,
इधर था कर्ण—जिसके पास था केवल अपना स्वाभिमान।
दोनों की राहें टकरानी थीं, यह निश्चित था,
यह युद्ध केवल अस्त्रों का नहीं—अहं का भी संघर्ष था।
एक था जन्म से श्रेष्ठ, एक कर्म से महान,
यही टकराव बनेगा आगे, महाभारत का प्राण।


महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण”
तृतीय सर्ग: सभा, अपमान और पतन

गूँज उठी हस्तिनापुर की, राजसभा गंभीर,
जुए की उस कुटिल ज्वाला में, जलता धर्म अधीर।
राजसिंहासन काँप उठा था, न्याय हुआ लाचार,
धर्मराज भी हार चुके थे, हार गए अधिकार।
सभा सजी थी भव्य किन्तु, भीतर था अंधकार,
जहाँ नीति बिकती थी खुलकर, और मौन था सत्कार।
दुर्योधन था गर्वित खड़ा, आँखों में अहंकार,
और वहीं पर बैठा कर्ण, लिए हुए तलवार।
युधिष्ठिर ने दाँव पर रख दी थी, अपनी हर पहचान,
राज, स्वत्व, भाई, और अंत में—पत्नी का भी मान।
यहाँ तक आते-आते ही, टूट चुका था धर्म,
पर असली पतन अभी था, आगे होने कर्म।
खींची गई सभा के बीच, वह नारी अपमानित,
द्रौपदी—जिसकी गरिमा से था, पाँचों का सम्मान नत।
प्रश्न उठे उसके अधरों से—“क्या मैं दासी हूँ?”
“जो खुद को हार चुका, वह क्या मेरा स्वामी हूँ?”
सभा थी मौन, शास्त्र थे चुप, भीष्म भी थे स्थिर,
धर्म की उस परीक्षा में, हर कोई था अधीर।
तभी उठा वह स्वर कठोर, जिसने सब कुछ तोड़ दिया—
कर्ण था वह, जिसने नारी को, शब्दों से ही छोड़ दिया।
कर्ण बोला—
“जिसे पति ने हार दिया, वह अब दासी है,”
“राजसभा में दासी का वस्त्रहरण भी वैसी है!”
ये शब्द नहीं थे केवल—यह पतन की शुरुआत थी,
जिस कर्ण में तेज था इतना, वहीं से उसकी हार थी।
सोचो—यही वह क्षण था, जहाँ कर्ण गिर गया,
जहाँ उसका पूरा संघर्ष, एक वाक्य में बिखर गया।
जिसने जीवन भर अपमान सहा, वही अपमान का कारण बना,
जिसने न्याय के लिए लड़ा, वही अन्याय का दर्पण बना।
यहाँ कोई बहाना नहीं—
न “मजबूरी”, न “परिस्थिति” का सहारा,
यहाँ कर्ण ने चुना स्वयं—
गलत का साथ, और यही है सारा।
दुर्योधन की मित्रता थी—हाँ, यह सत्य है,
पर मित्रता अंधी हो जाए, तो वह भी पाप ही है।
कर्ण ने कर्ज चुकाने में, धर्म को बेच दिया,
और यही उसकी छवि पर, सबसे बड़ा दाग दिया।
वह कर्ण जो था दानी, जो था वीर महान,
वही कर्ण उस दिन बना, एक क्रूर अपमान।
इतिहास यहीं नहीं देखता, कि तुमने क्या पाया,
वह देखता है—जब मौका था, तब तुमने क्या किया।
सभा में एक और स्वर उठा—
विकर्ण ने किया विरोध, कहा—“यह अन्याय है!”,
पर सत्य की वह लौ भी, बहुमत में हार गई।
भीष्म, द्रोण, कृप—सब थे, पर कोई न बोला,
और कर्ण का वह वचन, सबसे गहरा विष घोला।
फिर हुआ वह चमत्कार, जिसने धर्म बचा लिया,
जब हर दिशा अंधकार थी, तब ईश्वर ने साथ दिया।
द्रौपदी की लाज बची, पर दाग रह गया,
कर्ण के चरित्र पर, यह कलंक सदा के लिए ठहर गया।


महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण”
चतुर्थ सर्ग: रणनीति, सत्य और अस्वीकार

रात उतर आई थी धीमे, रण से पहले शांति,
पर उस शांति के भीतर थी, चालों की भ्रांति।
हर ओर युद्ध की आहट, हर मन में संशय,
पर एक पुरुष था जाग रहा—शतरंज लिए नयन।
वह था मुस्कान ओढ़े, गूढ़ विचारों का धाम,
कृष्ण—रणनीति जिसका था नाम।
न धनुष, न शस्त्र उठाया, फिर भी सबसे प्रखर,
वह युद्ध बिना लड़े ही, कर सकता था असर।
कृष्ण चले उस पथ पर, जहाँ कर्ण था एकाकी,
मन में द्वंद्व भरा हुआ, पर आँखों में थी आग बाकी।
दोनों आमने-सामने आए, जैसे समय ठहर गया,
एक था नीति का ज्ञाता, एक भाग्य से लड़ गया।
कृष्ण ने देखा कर्ण को, मुस्कान लिए गंभीर,
“जानता हूँ मैं तुझको, तू साधारण नहीं वीर।”
“तेरी कहानी अधूरी है, और सत्य छुपा हुआ,
जिसे जानकर हिल जाएगा, तेरा हर इक धुआँ।”
कर्ण हँसा—
“मुझे न समझाओ तुम, मैं अपना पथ जानता हूँ,”
“जिसने ठुकराया जग ने, मैं वही पहचानता हूँ।”
“मित्रता मेरी पूँजी है, और वही मेरा धर्म,”
“जिसने साथ दिया संकट में, वही है मेरा कर्म।”
कृष्ण ने धीरे से बोला—
“मित्रता अच्छी है, पर सत्य से बड़ी नहीं,”
“तू जिस पक्ष में खड़ा है, वह उतना सधा नहीं।”
“और सुन—जो तुझे पता नहीं, वह आज बता दूँ,”
“तू सूतपुत्र नहीं कर्ण—यह भ्रम भी हटा दूँ।”
“तू है ज्येष्ठ पुत्र उसी का, जिसे जग कहता कुंती,”
कुंती—जिसकी गोद से छूटी तेरी यह भाग्य रेखा अनूठी।
“तू पांडवों का अग्रज है, उनका ही अधिकार,”
“राजसिंहासन तेरा है, न कि दुर्योधन का द्वार।”
यह वाक्य नहीं था—वज्र था, जो सीधे हृदय में गिरा,
कर्ण का सारा जीवन जैसे, एक क्षण में ही बिखरा।
जिस पहचान से लड़ता आया, वह झूठी निकल गई,
जिस सत्य को ठुकराया था, वही सामने चल गई।
कर्ण चुप था—पर भीतर था, तूफानों का शोर,
“मैं कौन हूँ?”—यह प्रश्न अब, काट रहा था जोर।
एक ओर था जन्म का सच, जो सब कुछ बदल सकता,
दूसरी ओर वह मित्र था, जो सब कुछ संभाल सकता।
कृष्ण ने वार किया अगला—
“आ जा कर्ण, अपना स्थान तू वापस ले ले,”
“पांडवों का राजा बन, यह युद्ध यहीं खत्म कर दे।”
“तेरे आगे झुकेंगे सब, यश होगा अपार,”
“इतिहास तुझे पूजेगा—बनकर धर्माधिकार।”
अब यहाँ असली खेल था—
यह प्रस्ताव नहीं था केवल, यह जाल भी था,
कृष्ण जानता था—अगर कर्ण हिल गया,
तो दुर्योधन अकेला रह जाएगा, और युद्ध पहले ही जीत लिया जाएगा।
कर्ण ने आँखें उठाईं—
अब उसमें क्रोध नहीं, एक ठंडी स्पष्टता थी,
वह समझ चुका था—यह चाल कितनी गहरी थी।
कर्ण बोला—
“सत्य बताया तुमने—इसके लिए आभारी हूँ,”
“पर यह सत्य मेरे लिए अब केवल जानकारी है, अधिकार नहीं।”
“जिस माँ ने जन्म दिया, उसने त्याग दिया,
जिसने अपनाया—वह अधिरथ था, वही मेरा पिता।”
“और जिसने अपमान के दलदल से उठाकर,
मुझे सिंहासन दिया—वह दुर्योधन है।”
“मैं कर्जदार हूँ उसका—और यह कर्ज खून से चुकाऊँगा,”
“भले ही जानता हूँ, इस युद्ध में शायद मैं मर जाऊँगा।”
“पर मैं पक्ष नहीं बदलूँगा—
क्योंकि मैं अवसरवादी नहीं हूँ।”
यह उत्तर सरल नहीं था—
यह वही जगह थी जहाँ कर्ण महान भी लगता है,
और मूर्ख भी।


महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण”
पंचम सर्ग: रण, पतन और अमरता

उषा की अरुणिमा फैली, रण का दिवस महान,
कुरुक्षेत्र की धूल में लिखने को था इतिहास नया विधान।
शंखनाद से काँप उठा, पृथ्वी का कण-कण,
आज टकराने वाले थे—दो प्रखर धनुर्धर जन।
एक ओर था धर्म का ध्वज, एक ओर स्वाभिमान,
एक ओर गुरु का गौरव, एक ओर अपमान।
आमने-सामने खड़े हुए—वज्र समान प्राण,
अर्जुन और कर्ण—रण के दो तूफान।
रथों की गर्जना गूँजी, बाणों की वर्षा तेज,
आकाश स्वयं थर्राया था, देखकर उनका वेग।
अर्जुन था अचूक निशाने में, गुरु-द्रोण का मान,
कर्ण था तप की अग्नि में तपकर बना हुआ तूफान।
हर वार में बिजली थी, हर प्रहार में शौर्य,
दोनों ही थे अद्वितीय—दोनों में ही गौरव-गौर्य।
धरती भी जैसे रुक-रुक कर, यह दृश्य निहार रही,
किसके पक्ष में जाए—यह सोच विचार रही।
तभी नियति ने खेल किया—वह क्षण आया कठोर,
रथ का पहिया धँस गया, धरती के भीतर चोर।
शापों ने ली अंगड़ाई—समय हुआ निर्दयी,
जो बोया था भाग्य ने, वही काटने की घड़ी आई।
कर्ण उतरा रथ से, उठाने को वह पहिया,
पर भाग्य हँसा चुपचाप—“अब देख तेरा क़िस्सा।”
अस्त्र भूल गए हाथों को, मंत्र हुए बेगाने,
परशुराम का शाप वहीं, बनकर सामने आने।
कर्ण ने पुकारा—
“रुको अर्जुन! धर्म यही है—निर्बल पर वार न करो,”
“एक क्षण दो—मैं तैयार हो जाऊँ, फिर संग्राम करो!”
यह वही कर्ण था, जिसने सभा में धर्म तोड़ा था,
आज वही धर्म की दुहाई देकर, समय माँग रहा था।
रथ पर खड़े थे सारथी—
कृष्ण—जिनकी आँखों में रणनीति का प्रकाश,
उन्होंने कहा—
“अर्जुन! यही समय है—मत कर विलंब, कर प्रहार!”
“जिसने नारी का अपमान किया, उसे आज फल मिले,”
“धर्म का निर्णय रण में होता है—यह अवसर न छले!”
यहाँ भाव नहीं—निर्णय था,
यहाँ दया नहीं—रणनीति थी,
यहाँ न्याय का चेहरा भी,
कभी-कभी कठोर नीति थी।
अर्जुन ने उठाया गांडीव, बाण हुआ प्रज्वलित,
क्षण भर को ठिठका मन—पर लक्ष्य हुआ सुनिश्चित।
छूटा वह बाण—वज्र-सा, समय को चीरता गया,
कर्ण के वक्ष में धँसकर, उसका जीवन हर गया।
गिरा वह वीर धरा पर, पराजित नहीं—अमर,
उसकी आँखों में अब भी, था अदम्य सा स्वर।
जीवन हार गया था, पर व्यक्तित्व नहीं हारा,
कर्ण मिटा नहीं—वह इतिहास में उतरा सारा।
वह क्षण था—जहाँ मृत्यु भी झुक गई,
जहाँ हार भी सम्मान बन गई।
कर्ण का अंत हुआ—पर कथा अमर हो गई,
एक त्रुटिपूर्ण महानता, सदा के लिए स्थिर हो गई।
महिमा का क्षण (आखिरी चोट):
कहते हैं—जब कर्ण पड़ा था, रणभूमि में निस्सहाय,
तब स्वयं कृष्ण आए, परखे उसका दान-स्वभाव अथाह।
वेष बदलकर माँगा दान—उससे अंतिम समय,
कर्ण हँसा—“जीवन भर दिया, अब क्या है शेष नय?”
तब उसने तोड़ दिया अपना, स्वर्णिम दंत महान,
रक्त से भीगा हुआ वह, दे दिया अंतिम दान।


महिमा का क्षण (आखिरी चोट):

कहते हैं—जब कर्ण पड़ा था, रणभूमि में निस्सहाय,
तब स्वयं कृष्ण आए, परखे उसका दान-स्वभाव अथाह।
वेष बदलकर माँगा दान—उससे अंतिम समय,
कर्ण हँसा—“जीवन भर दिया, अब क्या है शेष नय?”
तब उसने तोड़ दिया अपना, स्वर्णिम दंत महान,
रक्त से भीगा हुआ वह, दे दिया अंतिम दान।


अंतिम पंक्तियाँ 
वह सूर्यपुत्र था—पर छाया में जीवन जिया,
वह दानी था—पर अपमान का घूंट पिया।
वह वीर था—पर नीति में नीतिकार से हारा,
फिर भी वह कर्ण था—जो मृत्यु में भी न झुका, न हारा।
“वह गिरा नहीं—
वह स्थापित हुआ,
एक ऐसे शिखर पर,
जहाँ महानता और त्रुटि—दोनों साथ खड़े हैं।”


महाकाव्य: “रश्मिपुत्र कर्ण”
उपसंहार: स्वीकार, शोक और सत्य
धूल बैठ चुकी थी रण की, शंख हुए थे मौन,
विजय का भी स्वाद फीका था, हर चेहरे पर शोक।
कुरुक्षेत्र की उस मिट्टी में, केवल रक्त ही नहीं,
टूटे हुए स्वप्न पड़े थे, अधूरे हर कहीं।
पांडव खड़े थे मौन वहाँ, जीत लिए थे राज्य,
पर आँखों में प्रश्न थे गहरे—“क्या यही है आज?”
धर्म की इस जीत में भी, एक खालीपन था,
जैसे कुछ अमूल्य खो गया—जो लौटेगा न अब।
तभी आगे बढ़े धीरे से, वह नीति के ज्ञाता,
कृष्ण—जिन्होंने देखा सबका नाता।
उनकी दृष्टि गई उस ओर, जहाँ कर्ण पड़ा शांत,
वह शरीर नहीं था केवल—वह एक अधूरा गान।
कृष्ण बोले धीमे स्वर में—
“यह युद्ध हमने जीता है, पर पूर्ण विजय नहीं,”
“क्योंकि जो गिरा यहाँ, वह केवल शत्रु नहीं।”
“यह वह पुरुष था, जो यदि सही दिशा में होता,
तो इतिहास का स्वरूप ही कुछ और ही होता।”
पांडव चौंके—
यह कैसी वाणी? यह कैसा सम्मान?
जिसे जीवन भर शत्रु माना, आज वही महान?
तभी प्रकट हुआ वह सत्य, जो छुपा था वर्षों से,
कृष्ण ने कहा—
“यह कर्ण, तुम सबसे बड़ा है—जन्म से, कर्मों से।”
“यह तुम्हारा अग्रज था—कुंती का प्रथम संतान,”
कुंती का वह त्यागा हुआ, पर तेजस्वी वरदान।
यह सुनते ही काँप उठी, हर आत्मा, हर प्राण,
युधिष्ठिर का मुख पीला पड़ा—टूट गया अभिमान।
जिसे शत्रु समझकर लड़ा, वह तो अपना ही था,
जिसे गिराया रणभूमि में—वह अपना ही था।
युधिष्ठिर बोले काँपते स्वर में—
“तो क्या हमने अपने ही रक्त को मारा है?”
“यह कैसी विजय है, जिसमें अपना ही हारा है?”
उनकी आँखों में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा,
धर्मराज का धर्म भी आज कहीं खो सा गया।
कृष्ण ने उत्तर दिया—
“सत्य कभी सरल नहीं होता, यह समझना होगा,”
“हर महान व्यक्ति के भीतर, एक संघर्ष भी होता।”
“कर्ण महान था—पर उसके निर्णय गलत थे,”
“और यही कारण है कि उसके परिणाम कठोर थे।”
“पर याद रखो—
महानता केवल जीत में नहीं होती,
कभी-कभी हार में भी वह अमर हो जाती है।”
फिर कृष्ण आगे बढ़े, कर्ण के समीप झुके,
जैसे स्वयं इतिहास, उस क्षण में ठहर के रुके।
उन्होंने कहा—
“कर्ण! तूने जीवन भर संघर्ष किया,
तूने अपमान में भी स्वाभिमान जिया।”
“तू गिरा—पर झुका नहीं,
तू हारा—पर टूटा नहीं।”
“तू त्रुटिपूर्ण था—पर विशाल था,
तू गलत था—पर ईमानदार था।”
“और इसी कारण—
तू केवल योद्धा नहीं,
एक युग का प्रतीक है।”

अंतिम सम्मान:
कहते हैं—उस दिन सूर्य भी कुछ अधिक उदास था,
क्योंकि उसका पुत्र आज, धरती से विलग हुआ था।
न देवता रोए, न गाथाएँ गाईं गईं,
पर इतिहास के पन्नों में—एक गहरी रेखा खिंच गई।
प्रमोद कुमार सिंह (प्रवक्ता)
 श्री शिवदान सिंह इंटर कॉलेज, इगलास अलीगढ़

प्यार का परिणाम

कई बार हम प्यार के नाम पर 
अपनी खुशियों के ताले की चाबी 
किसी और को देते हैं। 

फिर होता ये है कि 
वो मुस्कुराए तो हम  खिल  उठते हैं, और वो चुप हो जाए 
तो हमारे भीतर भी सन्नाटा उतर आता है। 

धीरे-धीरे हम जीना भूल जाते हैं, 
और “महसूस करना” भी उधार का हो जाता है। 
सच तो ये है— ये जुड़ाव कम, 
और निर्भरता ज़्यादा है। 

प्यार अगर तुम्हें मजबूत नहीं बना रहा, तो वो तुम्हें धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। 

असली कला यही है— 
किसी से जुड़ो, लेकिन खुद से कटो मत।

 ...याद रखना—
सबसे जरूरी रिश्ता वही है
जो तुम्हारा
तुम्हारे अपने साथ है।

प्रिय विरह

शिव विरह गीत कैलाशों पर धूनी जलती, मन में फिर भी शोर है, भोले तेरे बिना ये जीवन जैसे सूना भोर है। गंगा भी अब मौन खड़ी है, चाँद भी फीका...