पुत्र वैभव के लिए

एक ऐसा पुरुष बनना तुम—
जो विपरीत परिस्थितियों में परुष हो,
जो अपने हालातों को दोष देने के बजाय
उन्हें बदलने की आदत रखता हो।
जिसके कदमों में मेहनत की ठसक हो,
मस्तिष्क में समझ और दूरदर्शिता हो 
जिसकी जेब भले भारी न हो,
पर कमाई साफ हो—
और नज़र झुकी न हो।
जो बोलने से पहले समझे,
और समझने के बाद डटे।
जिसके लिए स्त्री “सम्मान” का शब्द नहीं,
व्यवहार हो।
चेहरे पर सुकून भरा आत्मविश्वास
जो क्रोध में भी सीमा न लांघे,
और ताकत होने पर भी
उसका दिखावा न करे।
जो जिम्मेदारी से भागे नहीं—
उसे उठाए, निभाए, और चुपचाप पूरा करे।
क्योंकि असली पहचान शोर से नहीं बनती,
चरित्र से बनती है।

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