पंख और घोंसला - एक भूल, हज़ार साल

पंख और घोंसला
एक भूल, हज़ार साल



घोंसला बनाने में हम यूँ मशगूल हो गए,
कि उड़ने को पंख भी थे, ये हम भूल गए।


तिनका-तिनका जोड़ते, हम दीवारें चुनते गए,
खुला पड़ा था आसमाँ, और हम सिमटते गए।


रोटी, कपड़ा, मकान में सपने सब धूल हुए,
उड़ने वाले पंख भी किस्तों में मशगूल हुए।


कल की चिंता ढोते-ढोते आज भी खोता गया,
हँसता चेहरा भीतर ही भीतर चुपचाप रोता गया।


सुरक्षा की चाहत में पिंजरे अच्छे लगने लगे,
खुले गगन से ज़्यादा कमरे अच्छे अपने लगे।


बच्चों की पढ़ाई में अपने अरमान बिखर गए,
ज़िम्मेदारी ढोते-ढोते कितने मौसम गुजर गए।


याद करो वो दिन जब तुम बेख़ौफ़ उड़ा करते थे,
मुट्ठी भर सपनों लेकर बादलों से लड़ा करते थे।


अब भी वक़्त बचा है, पंख अभी बीमार नहीं,
घोंसला ज़रूरी है, पर उड़ना बेकार नहीं।


तोड़ो उन जंजीरों को, जो आदत बन भारी हैं,
ज़िंदगी जीने को मिली है, सिर्फ़ साँसें उधारी हैं।


— प्रमोद कुमार सिंह

मातृ दिवस

पैसे से सब मिल जाता है, पर वो स्पर्श नहीं मिलता,
थके हुए माथे को फिर वैसा हर्ष नहीं मिलता।
दुनिया भर की भीड़ में सब रिश्ते शर्तों वाले हैं,
मां ही बस वो रिश्ता है, जिसके हम मतवाले हैं।

द्वंद्व - एक प्रश्न, हज़ार रातें

द्वंद्व

एक प्रश्न, हज़ार रातें

उसे मैं प्रिय हूँ या नहीं, ये द्वंद्व है मन में रहता है,

यही इक प्रश्न रातों को, मुझे अब जगाने लगता है।

हँसी में उसकी बात करूँ, तो हाँ सा लगने लगता है,

ख़ामोशी में वो जब रहे, तो ना सा लगने लगता है।

नज़र मिले तो फूल खिलें, मन बाग़ सा लगने लगता है,

नज़र फिरे तो हर रिश्ता, वीरान सा लगने लगता है।

वो पास रहे तो हर मौसम, मधुमास सा लगने लगता है,

वो दूर जाए तो जीवन भी, वनवास सा लगने लगता है।

एक पल कह दे “तुम ही तो हो”, सब अपना सा लगने लगता है,

दूजे पल वो चुप हो जाए, सब सपना सा लगने लगता है।

उसकी हाँ में हाँ मिलाऊँ, तो खुद से छलने लगता है,

उसकी ना को सच मानूँ, तो मन ही गलने लगता है।

चाँद से पूछूँ राज़ ये, वो भी ढलने लगता है,

तारों का हर उत्तर मुझको, भ्रम सा लगने लगता है।

दिल से पूछूँ हाल अगर, वो भी जलने लगता है,

तेरा नाम लेते-लेते, स्वर भी थमने लगता है।

भीड़ भरे इन रास्तों में, तनहा चलने लगता है,

अपना ही साया अब मुझसे, कुछ-कुछ डरने लगता है।

तेरी यादों का हर मौसम, आँख भिगोने लगता है,

सूखा मन भी तेरे कारण, दरिया होने लगता है।

न कह सकता हूँ बात ये, होंठ सिले से लगने लगता हैं,

न सह सकता हूँ घात ये, घाव खुले से लगने लगे हैं।

बस एक जवाब की आस में, हर लम्हा खलने लगा है,

कि उसे मैं प्रिय हूँ या नहीं, ये द्वंद्व कलेजा निगलने लगा है।

ऐ काश वो कह दे इक बार — “हाँ, तुम भी तो प्रिय हो”,

तो ये रातों का जगना भी, सवेरा सा लगने लगा है।

वरना ये प्रश्न अधूरा सा, साँसों को छलने लगा है,

और ये द्वंद्व मुझे हर दिन, थोड़ा-थोड़ा मरने लगा है।


— प्रमोद कुमार सिंह

मर्द की थकी हुई मुस्कान






सुबह-सुबह फिर निकल पड़ा वो,
कंधों पर संसार लिए,
अपने हिस्से धूप न माँगी,
सबके लिए बहार लिए।

घर की खुशियों की खातिर ही,
हर दर्द दबाना पड़ता है,
मर्द को अक्सर हँसते-हँसते
अंदर से मरना पड़ता है।

माँ की दवा, बच्चे की फीस,
बाप की उम्मीदें साथ,
पत्नी के सपनों की खातिर
दिन और रात एक किये।

अपने जख्म छुपाकर वो तो
सबको हिम्मत देता है,
टूटी चप्पल, थका बदन फिर
रोटी का वादा देता है।

कौन समझता उसकी चुप्पी,
कौन पढ़े मन की भाषा,
सबको बस मजबूत दिखे वो,
भीतर टूटी हर आशा।

रोना चाहे तो भी आखिर
आँसू पी जाना पड़ता है,
मर्द को अक्सर किस्मत से
हर दिन लड़ जाना पड़ता है।

ना कोई माला, ना ताली,
ना कोई सम्मान मिला,
बस जिम्मेदारी के बदले
जीवन भर का काम मिला।

फिर भी चेहरे पर मुस्कानें
घर की खातिर रखता है,
अपने सपनों की चिता पर
सबका भविष्य लिखता है।

ईश्वर उससे पूछे एक दिन —
“थककर आखिर क्या पाया?”
वो हँसकर बस इतना बोले —
“अपनों को खुश देख पाया।”

यही जीत है, यही कमाई,
यही उसका अभिमान रहा,
दुनिया चाहे कुछ भी समझे,
मर्द सदा बलिदान रहा।

— प्रमोद कुमार सिंह

तुम दिल में रहो

“तुम दिल में रहो” 

💞
रिश्ता बनाया है तो निभाएँगे,
हर मोड़ पे साथ ही आएँगे।
तुमसे ही रूठेंगे हम कभी,
तुमको ही फिर से मनाएँगे।।
🌸
तुम दिल में रहो इतना ही बहुत,
साँसों में महकते रहना तुम।
दूरी चाहे जितनी भी हो,
आँखों में चमकते रहना तुम।।

💞
तुमसे बातें, तुमसे शिकवे,
तुमसे ही हर अफ़साना है।
भीड़ भरी इस दुनिया में,
बस तेरा साथ सुहाना है।।

💞
कभी हँसी बनकर आ जाना,
कभी आँसू बन बह जाना।
अगर कभी हम खो भी जाएँ,
तुम बनकर राह दिखाना।।

💞
मुलाक़ातों की चाह नहीं,
बस एहसास तुम्हारा काफी है।
दिल के इस छोटे से घर में,
एक नाम तुम्हारा काफी है।।

💞
तुमसे ही लड़ना अच्छा लगे,
तुमसे ही प्यार जताएँगे।
ये रिश्ता साँसों जैसा है,
मरते दम तक निभाएँगे।।
💞
तुम दिल में रहो इतना ही बहुत,
मिलने की कोई ज़रूरत नहीं।
कुछ रिश्ते रूह में बसते हैं,
उनकी कोई दूरी नहीं।।
— प्रमोद कुमार सिंह द्वारा प्रस्तुति

प्रकृति रोती है

फूल समझते तितली का दु:ख, खुद को चूस जाने देते।

पत्ते समझते पेड़ का दु:ख खुद, को झर जाने देते।

पहाड़ समझते नदियों का दु:ख, खुद को पीस जाने देते।

बाती समझती दीपक का दु:ख, खुद को जल जाने देती।

आसमान समझता धरती का दु:ख, खुद को बरस जाने देता।

सूरज समझता रात का दु:ख, खुद को जल जाने देता।

धागा समझता माला का दुख, खुद को बन्ध जाने देता।

साज समझता राग का दुख, खुद को बज जाने देता।

पर देखो विधि का कैसा खेल, कैसा ये संसार है,

मानव ही न समझे मानव का दुःख, ये कैसा व्यवहार है? 


दिल सीने में धड़कता नहीं, आंखों में नमी नहीं,

दूसरे के जख्मों पर मरहम रखने की कमी नहीं। 


पास बैठे हैं पर कोसों दूर, बातें हैं पर मौन है,

आंसू गिरें तो हंसी उड़े,  ये कैसा दौर है? 


इसीलिए तो तोड़ा मैंने जग से नाता सारा,  

जब मेरे किस्से का हर किरदार निकला गद्दारा।


अब समझ गया हूं मैं जग का सारा लेखा-जोखा,

कि प्रकृति रोती है साथ में, सबका दुःख है धोखा।


पर इंसान हंसता है लाश पे, जश्न मनाता मातम में, 

इसीलिए तो त्याग दिया मोह, जी रहा हूं खातम में।

पर मानव न समझे मानव का दु:ख, दिल है पर धड़कता ही नहीं।

मानव दूसरे के दुःख में सिहरता नहीं।

कोई बात बने


कोई बात बने

मेरे लिखने से क्या, जो तुम ना पढ़ो,  
तुम पढ़ लो जरा तो कोई बात बने।

मेरे सोचने से क्या, जो तुम ना समझो,  
तुम समझ लो जरा तो कोई बात बने।

मैं चुप रहूं तो क्या, जो तुम ना बोलो,  
तुम बोल दो जरा तो कोई बात बने।

मैं फूल बनूं तो क्या, जो महक ना आए,  
तुम खुशबू बनो तो कोई बात बने।

मेरे चाहने से क्या, जो एहसास ना हो,  
तुम महसूस करो तो कोई बात बने।

मैं बेरंग रहूं तो क्या, जो तुम ना रंगो,  
तुम रंग भरो तो कोई बात बने।

मेरे हाथ बढ़े तो क्या, तुम रुके रहो,  
तुम भी हाथ बढ़ाओ तो कोई बात बने...!!


पंख और घोंसला - एक भूल, हज़ार साल

पंख और घोंसला एक भूल, हज़ार साल घोंसला बनाने में हम यूँ मशगूल हो गए, कि उड़ने को पंख भी थे, ये हम भूल गए। तिनका-तिनका जोड़ते...