द्वंद्व - एक प्रश्न, हज़ार रातें

द्वंद्व

एक प्रश्न, हज़ार रातें

उसे मैं प्रिय हूँ या नहीं, ये द्वंद्व है मन में रहता है,

यही इक प्रश्न रातों को, मुझे अब जगाने लगता है।

हँसी में उसकी बात करूँ, तो हाँ सा लगने लगता है,

ख़ामोशी में वो जब रहे, तो ना सा लगने लगता है।

नज़र मिले तो फूल खिलें, मन बाग़ सा लगने लगता है,

नज़र फिरे तो हर रिश्ता, वीरान सा लगने लगता है।

वो पास रहे तो हर मौसम, मधुमास सा लगने लगता है,

वो दूर जाए तो जीवन भी, वनवास सा लगने लगता है।

एक पल कह दे “तुम ही तो हो”, सब अपना सा लगने लगता है,

दूजे पल वो चुप हो जाए, सब सपना सा लगने लगता है।

उसकी हाँ में हाँ मिलाऊँ, तो खुद से छलने लगता है,

उसकी ना को सच मानूँ, तो मन ही गलने लगता है।

चाँद से पूछूँ राज़ ये, वो भी ढलने लगता है,

तारों का हर उत्तर मुझको, भ्रम सा लगने लगता है।

दिल से पूछूँ हाल अगर, वो भी जलने लगता है,

तेरा नाम लेते-लेते, स्वर भी थमने लगता है।

भीड़ भरे इन रास्तों में, तनहा चलने लगता है,

अपना ही साया अब मुझसे, कुछ-कुछ डरने लगता है।

तेरी यादों का हर मौसम, आँख भिगोने लगता है,

सूखा मन भी तेरे कारण, दरिया होने लगता है।

न कह सकता हूँ बात ये, होंठ सिले से लगने लगता हैं,

न सह सकता हूँ घात ये, घाव खुले से लगने लगे हैं।

बस एक जवाब की आस में, हर लम्हा खलने लगा है,

कि उसे मैं प्रिय हूँ या नहीं, ये द्वंद्व कलेजा निगलने लगा है।

ऐ काश वो कह दे इक बार — “हाँ, तुम भी तो प्रिय हो”,

तो ये रातों का जगना भी, सवेरा सा लगने लगा है।

वरना ये प्रश्न अधूरा सा, साँसों को छलने लगा है,

और ये द्वंद्व मुझे हर दिन, थोड़ा-थोड़ा मरने लगा है।


— प्रमोद कुमार सिंह

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