पंख और घोंसला
एक भूल, हज़ार साल
घोंसला बनाने में हम यूँ मशगूल हो गए,
कि उड़ने को पंख भी थे, ये हम भूल गए।
तिनका-तिनका जोड़ते, हम दीवारें चुनते गए,
खुला पड़ा था आसमाँ, और हम सिमटते गए।
रोटी, कपड़ा, मकान में सपने सब धूल हुए,
उड़ने वाले पंख भी किस्तों में मशगूल हुए।
कल की चिंता ढोते-ढोते आज भी खोता गया,
हँसता चेहरा भीतर ही भीतर चुपचाप रोता गया।
सुरक्षा की चाहत में पिंजरे अच्छे लगने लगे,
खुले गगन से ज़्यादा कमरे अच्छे अपने लगे।
बच्चों की पढ़ाई में अपने अरमान बिखर गए,
ज़िम्मेदारी ढोते-ढोते कितने मौसम गुजर गए।
याद करो वो दिन जब तुम बेख़ौफ़ उड़ा करते थे,
मुट्ठी भर सपनों लेकर बादलों से लड़ा करते थे।
अब भी वक़्त बचा है, पंख अभी बीमार नहीं,
घोंसला ज़रूरी है, पर उड़ना बेकार नहीं।
तोड़ो उन जंजीरों को, जो आदत बन भारी हैं,
ज़िंदगी जीने को मिली है, सिर्फ़ साँसें उधारी हैं।
— प्रमोद कुमार सिंह
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें