शिव विरह गीत
कैलाशों पर धूनी जलती,
मन में फिर भी शोर है,
भोले तेरे बिना ये जीवन
जैसे सूना भोर है।
गंगा भी अब मौन खड़ी है,
चाँद भी फीका लगता है,
तेरे विरह में भोलेनाथ,
हर श्वास अधूरा लगता है।
डमरू की वो धुन ना सुनूँ तो,
मन जंगल हो जाता है,
“ॐ नमः शिवाय” जपते-जपते
आँसू ही अभिषेक बन जाता है।
राख लगे उस रूप को ढूँढूँ,
हर मंदिर हर घाट में,
पर शिव मिलते हैं अक्सर
टूटे हुए हालात में।
विरह तेरा भी प्रसाद है भोले,
ये अब मन ने मान लिया,
तू पास नहीं फिर भी मैंने
तुझको अपना मान लिया।
ना मिलने का दुख भी मीठा,
जब नाम तुम्हारा साथ रहे,
शिव प्रेम वही सच्चा है
जो विरह में भी साथ रहे।
– PKS
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