दो महाकाव्य दो दर्पण


एक में मर्यादा का सूर्य उदित,
एक में प्रश्नों का अंधकार,
एक में सीधा धर्म का पथ,
एक में धर्म ही लाचार…

एक ओर राम—त्याग की परिभाषा,
राजा होकर भी वन का रास्ता चुना,
वचन के लिए जीवन त्यागा,
धर्म को हर सांस में बुना…

दूसरी ओर युधिष्ठिर—धर्मराज कहलाए,
पर एक पासे में सब कुछ हार गए,
सत्य के रक्षक होकर भी,
जुए में अपनों को दाँव पर मार गए…

वहाँ सीता अग्नि में तपकर भी पवित्र,
फिर भी प्रश्नों के घेरे में रहीं,
यहाँ द्रौपदी सभा में अपमानित हुई,
और धर्म की आँखें झुकी रहीं…

एक में हनुमान—भक्ति की सीमा,
निस्वार्थ सेवा का उदाहरण,
दूसरे में कर्ण—दानवीर महान,
पर गलत पक्ष का समर्पण…

एक ओर रावण—अहंकार का प्रतीक,
ज्ञान होते हुए भी पतन चुना,
दूसरी ओर दुर्योधन—अधर्म का चेहरा,
पर मित्रता में कर्ण को पूरा सुना…

और फिर आते हैं कृष्ण—
जहाँ धर्म सीधा नहीं, रणनीति बन जाता है,
जहाँ जीत के लिए छल भी,
कर्तव्य का हिस्सा बन जाता है…

तो एक कथा सिखाती है—
“कैसे होना चाहिए”,
और दूसरी दिखाती है—
“जब ऐसा नहीं होता, तब क्या होता है…”

रामायण आदर्श की गाथा है,
महाभारत यथार्थ का आईना,
एक में स्पष्ट है हर सीमा,
दूसरे में धुंधला हर नगीना…

सच यही है—
राम बनना कठिन है,
पर कृष्ण को समझना उससे भी कठिन…

क्योंकि मर्यादा में जीना आसान है,
पर जटिलता में धर्म निभाना—
वहीं असली अग्नि परीक्षा है…

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