कई बार हम प्यार के नाम पर
अपनी खुशियों के ताले की चाबी
किसी और को देते हैं।
फिर होता ये है कि
वो मुस्कुराए तो हम खिल उठते हैं, और वो चुप हो जाए
तो हमारे भीतर भी सन्नाटा उतर आता है।
धीरे-धीरे हम जीना भूल जाते हैं,
और “महसूस करना” भी उधार का हो जाता है।
सच तो ये है— ये जुड़ाव कम,
और निर्भरता ज़्यादा है।
प्यार अगर तुम्हें मजबूत नहीं बना रहा, तो वो तुम्हें धीरे-धीरे खोखला कर रहा है।
असली कला यही है—
किसी से जुड़ो, लेकिन खुद से कटो मत।
...याद रखना—
सबसे जरूरी रिश्ता वही है
जो तुम्हारा
तुम्हारे अपने साथ है।
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