दिन था शिवरात्रि का, मंदिर की घंटियों की आवाज उस सुबह कुछ अलग थी। 56 वर्षीय अरविंद, जो अपने अनुशासित जीवन, सुदृढ़ शरीर और संतुलित दांपत्य के लिए जाने जाते थे, रोज की तरह व्यायाम के बाद मंदिर पहुँचे कर मंदिर को सजा रहे थे। मंदिर का कार्य उनकी दैनिक दिनचर्या का एक अंग था। उनका जीवन सीधा था— वह कॉलेज में एक अनुशासित अध्यापक के रूप में जाने जाते थे। कॉलेज में अध्यापन, घर में पत्नी का स्नेह, और बेटे के भविष्य की चिंता।
उसी सुबह उनकी नज़र पहली बार उस पर पड़ी—नीरा।
45 वर्ष की, सादगी में भी एक गहराई लिए हुए। चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में अजीब-सी स्थिरता, फिर भी हंसमुख स्वभाव। बाद में पता चला—वह भी अध्यापिका है, दो बेटियों की माँ।
पहली मुलाकात बस एक संयोग थी या नियति, दरबार भोले का था और दोनों भोले के भक्त, उनकी पक्षी ने पूछा आप कहां से तो अरविंद जी ने जवाब दिया- बनारस से, फिर क्या था, दोनों भोले की नगरी से—एक हल्की-सी नमस्ते, और फिर अपने-अपने रास्ते। लेकिन मंदिर के परिसर में अरविंद का घर और मंदिर में नीरा का आने- जाने से दोनों घरों की नज़दीकी ने इस संयोग को धीरे-धीरे प्रगाढ़ परिचय में बदल दिया।
कुछ ही हफ्तों में, दोनों परिवारों का आना-जाना शुरू हो गया। अरविंद की पत्नी, स्नेही और समझदार, नीरा से सहज ही घुल-मिल गई। नीरा की बेटियाँ भी अरविंद के घर आने लगीं।
सब कुछ सामान्य था—कम से कम बाहर से।
पर अंदर… कुछ बदल रहा था।
अरविंद खुद को समझाते—“ये सिर्फ सहानुभूति है… एक अकेली स्त्री के लिए।”
लेकिन हर बार जब नीरा मुस्कुराती, या किसी गहरी बात को आधे शब्दों में कहकर चुप हो जाती, अंदर ज्वालामुखी लावा भरा पड़ा था, जिसे महसूस किया जा सकता था। तो अरविंद के भीतर कुछ हलचल होने लगती।
एक दिन, कॉलेज से लौटते समय दोनों साथ चल रहे थे। रास्ता छोटा था, पर उस दिन लंबा लग रहा था।
“आप हमेशा इतने शांत रहते हैं?” नीरा ने पूछा।
अरविंद हल्का-सा मुस्कुराए, “शांत दिखता हूँ… अंदर उतना नहीं हूँ।”
नीरा ने उनकी ओर देखा, जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रही हो, पर फिर नजरें हटा लीं।
बस यही था—उनके रिश्ते की सबसे बड़ी सच्चाई।
कुछ था… पर कहा नहीं गया।
दिन बीतते गए। अरविंद के मन में यह भावना अब साफ थी—यह सिर्फ सहानुभूति नहीं, कुछ और है। लेकिन साथ ही एक और सच्चाई भी थी—वह अपने विवाह से संतुष्ट थे, अपनी पत्नी के प्रति जिम्मेदार थे।
एक रात, उन्होंने खुद से सवाल किया—
“क्या यह प्यार है… या एक खालीपन का भ्रम?”
उधर नीरा… वह हमेशा एक दूरी बनाए रखती।
न ज्यादा करीब, न पूरी तरह दूर।
कभी उसकी आँखों में एक नरमी दिखती, तो कभी एक सख्त दीवार खड़ी हो जाती। जैसे वह खुद भी तय नहीं कर पा रही हो—या शायद वह तय कर चुकी थी, और बस कह नहीं रही थी।
एक शाम मंदिर में आरती के दौरान, दोनों आमने-सामने खड़े थे।
भीड़ थी, शोर था… लेकिन उनके बीच एक अजीब-सी खामोशी।
अरविंद ने धीरे से कहा,
“कुछ बातें कह देने से आसान हो जाती हैं।”
नीरा ने बिना उनकी ओर देखे जवाब दिया,
“और कुछ बातें कह देने से सब कुछ मुश्किल भी हो जाता है।”
बस… वहीं बात खत्म हो गई।
उस दिन के बाद, दोनों ने अपने-अपने दायरे थोड़े और मजबूत कर लिए।
मुलाकातें जारी रहीं, बातचीत भी… लेकिन वो अनकहा रिश्ता अब एक समझौते में बदल चुका था।
अरविंद ने समझ लिया—हर भावना को मुकाम मिलना जरूरी नहीं होता।
और नीरा… शायद वह पहले से ही यह जानती थी।
मंदिर की घंटियाँ आज भी बजती हैं।
बस फर्क इतना है—अब दोनों की खामोशियाँ थोड़ी और गहरी हो गई हैं।
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