पागल मन का पागलपन

बावरा मन निकला था, एक अधूरा ख्वाब लिए,
भीड़ भरे इस जग में, खुद से ही सवाल लिए।

कभी शांति की तलाश में, कभी प्रेम के जाल में,
खुद को ही ढूंढता रहा, अपने ही बवंडर हाल में।

ये प्यास भी अजीब है, बुझती नहीं किसी रीत से,
ये आस भी बावरी है, जुड़ती नहीं किसी प्रीत से।

जब थक कर बैठा मन, सन्नाटे की छांव में,
तब जाना—जिसे ढूंढा, वो था अपने ही गाँव में।

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