मेरे बच्चे तू अनमोल

भविष्य तेरे समक्ष खड़ा है,
फिर भी तू चुपचाप पड़ा है।
तेरा भुजबल बहुत बड़ा है,
हर पल है अनमोल।
उठ खड़ा हो आंखें खोल,
मेरे बच्चे  तू अनमोल।

तू अलसाया क्यों पड़ा है,
बहुत हुआ अब क्या होना है,
बचा-खुचा भी क्या खोना है,
तू अब भी 'सोना' है,
तू अपने को तोल।
उठ खड़ा हो आंखें खोल,
मेरे बच्चे तू अनमोल।

मातु-पिता ने कुल की,
अब तो तू जय बोल ।
ऐसी तेरी नींव पड़ी है,
जिस पर कुल की डोर बंधी है।
तू उन्हें मत खोल ।
उठ खड़ा हो आंखें खोल,
मेरे बच्चे तू अनमोल।

तुम अब भी सोना है,
तू अपने को तोल।
सबकी आंखों से देख स्वयं को,
तेरा वैभव है अनमोल।
उठ खड़ा हो आंखें खोल,
मेरे बच्चे तू अनमोल।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रिय विरह

शिव विरह गीत कैलाशों पर धूनी जलती, मन में फिर भी शोर है, भोले तेरे बिना ये जीवन जैसे सूना भोर है। गंगा भी अब मौन खड़ी है, चाँद भी फीका...