कीमती जिंदगी

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क़ीमत ज़िन्दगी की

युद्ध पर जा रहे बेटे ने जब तलवार अपने क़मर में बांधा और निकल रहा था तो जाने से पहले माँ ने क़सम दी थी।

हमला पहले मत करना, किसी निहत्ते पे वार मत करना, किसी बेटे को मत मारना शायद उसके माँ-बाप अकेले हों।
किसी बूढ़े आदमी को मत मारना हो सकता है उसकी घर की जरूरतें किसी पूजा से ज्यादा हों। 

किसी भी जानवर को बिल्कुल नहीं बल्कि उसे तो तुम्हारे तलवार से कोई ख़राश भी पाप होगा वो बेज़ुबान है, वो अपने दर्द की इन्तेहाँ बता नहीं पाएगा।

जितने लोगों को तुम मारोगे उन सबकी अपनी कहानियाँ होंगी जिससे तुम वाकिफ़ नही होगे, हो सकता है वो युद्ध में आए नहीं लाए गए हों, या उनकी मजबूरियाँ उन्हें लेके आईं होंगी।

कश्मकश में बेटे ने पूछा कि अगर किसी को मारना ही नहीं है तो मैं जा क्यों रहा हूँ, ऐसे सबको नापते तोलते मैं ही मर जाऊँगा। लड़ाइयों में चहरा कैसे पढ़ा जाएगा।

बहुत देर की चुप्पी के बाद माँ ने बस यही कहा की, प्यादे बन कर युद्ध में जा तो रहे हो मगर प्यादों से उलझने से बेहतर है

सीधे बादशाह को मारना।

अगर ये कर सकते हो तो बेशक़ जंग में जाओ वरना बेक़सूरों को मारकर कौन सा सवाब, कौन सी पूजा, काहे की मानवता।।।

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