प्रिय मित्र अरविंद

प्रिय मित्र ईश्वर सदैव तुम्हें स्वस्थ्य,सुखी, सम्पन्न और शतायु रखे। कल जयपुर से इगलास आते वक्त बार-बार अतीत से वर्तमान तक विचारो की एक बनती और टूट जाती। सड़क के किनारे अंधेरे में सफेदा के तनों की चमक उन्हें दिशा प्रदीप्त कर रही थी।
       मैं जब भी आप लोगों से मिलता हूँ तो मुझे लगता है, मैं एक अंधेरी सड़क से निकल कर उस रास्ते पर आ गया हूँ, जहां दोनों तरफ लैम्प पोस्ट मार्ग को प्रकाशित कर रहे है। जहाँ जीवन पथ को लेकर मन और मस्तिष्क में जो  भय व्याप्त था वह दूर हो गया है। मंजिल भले ही दूर हो, अज्ञात हो लेकिन पथ तो प्रकाशित है। प्रकाशित और भय विहीन पथ पर थके पथिक की भी चाल तीव्र हो जाती है।
       'यथा नाम: तथा गुणो' को को चरितार्थ करने वाला  अरविंद का अर्थ मेरे लिए भी उतना ही सार्थक रहा।अरविन्द का अर्थ लक्ष्मी प्रिय कमल पुष्प, सुन्दर, सुहावना और मधुर।
      अभी अभी ये पत्र लिखते हुए मुझे याद आया कि बचपन में मुझे ये इतना प्रिय था कि एक बार मैं अरविंद को प्राप्त करने के लिए तालाब में उतरा और डूबने लगा। उस समय मेरी उम्र 3, 4 या 5 की रही होगी बस। मित्र शायद तुम वही अरविंद हो। अगर वो अरविंद मुझे मिल भी गया होता तो उसके नाल की माला बना कर मैं उसे अपने गले में धारण करता और कुछ समय के बाद उसे निकाल कर फेंक देता।
     लेकिन मित्र ईश्वर ने मुझे एक ऐसा अरविंदानन्द कंठश्री प्रदान की जिसको पत्र लिखते समय मेरे शब्द कम पड़ने लगे।
          क्या आवश्यकता थी तुम्हें बार वैभव के बारे में पूछने की? उसकी पसंद, ना पसन्द से क्यों फर्क पड़ता है तुम्हारे ऊपर? ये प्रश्न अब मुझे अब मनन करने के लिए बेचैन कर रहे है।          ये सत्य है कि मुन्ना से मैं बहुत प्यार करता हूँ, उस श्रेणी में मेरा और कोई मित्र नही है और न ही वह स्थान किसी को दूँगा। उसने मेरे लिए अपने अनमोल आसुंओ की धारा बहाई है। वो मेरा कृष्ण है और मैं सुदामा। मुझे बहुत संकोच होता है उससे कुछ कहने में, माँगने में। यार सब कुछ जो मेरे पास है, वो सब तुम्हीं लोगों का तो दिया है।
अगर कुछ अन्यथा लिखा हो तो माफ करना
        शेष फिर  कभी 
                       तुम्हारा मित्र/भाई
   

जो प्राप्त है वही पर्याप्त है

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